अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा युद्ध को लेकर जिस नए शांति समझौते का ऐलान किया है, उसे उन्होंने पश्चिम एशिया में "स्थायी शांति" की दिशा में एक बड़ा 'ब्रेकथ्रू' बताया है। ट्रंप के अनुसार, हमास और गाजा में सक्रिय अन्य सशस्त्र संगठनों ने हथियार छोड़ने (Disarmament) पर सहमति जताई है। इसके बदले इज़रायल गाजा से अपनी सेना चरणबद्ध तरीके से वापस बुलाएगा और वहां एक नई फिलिस्तीनी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जाएगी। अगर यह समझौता पूरी तरह लागू हो जाता है, तो यह केवल युद्धविराम नहीं होगा, बल्कि गाजा की पूरी राजनीतिक, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था बदल जाएगी। हालांकि, इसकी राह आसान नहीं है।
ट्रंप के शांति प्रस्ताव में क्या है?
ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना के तहत गाजा में युद्ध समाप्त करने, इज़रायली सेना की पूर्ण वापसी, हमास सहित सभी सशस्त्र गुटों के निरस्त्रीकरण, एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी प्रशासनिक समिति को शासन सौंपने और गाजा के पुनर्निर्माण का रोडमैप तैयार किया गया है। योजना के मुताबिक, गाजा का प्रशासन एक स्वतंत्र नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (NCAG) संभालेगी। यही समिति सरकारी सेवाओं, कानून-व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन और पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठाएगी। इसके साथ एक अंतरराष्ट्रीय सत्यापन समिति (IVC) और अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) पूरे समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी करेंगे। हमास ने इस प्रक्रिया पर सहमति जताई है, लेकिन उसने स्पष्ट किया है कि उसका पूर्ण निरस्त्रीकरण तभी होगा, जब इज़रायल पहले गाजा से पूरी तरह अपनी सेना वापस बुलाएगा।
हमास के लिए हथियार छोड़ना इतना बड़ा फैसला क्यों?
हमास की स्थापना 1987 में पहले इंतिफ़ादा (First Intifada) के दौरान हुई थी। संगठन का उद्देश्य इज़रायल के कब्जे का विरोध करना और फिलिस्तीनी राजनीति में फतह के प्रभाव को चुनौती देना था। पिछले लगभग चार दशकों में हमास की पहचान उसकी सशस्त्र प्रतिरोध (Armed Resistance) की नीति रही है। 2017 में जारी अपने राजनीतिक दस्तावेज में उसने साफ कहा था कि "प्रतिरोध और उसके हथियारों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।" यानी हथियार केवल उसकी सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक पहचान का भी हिस्सा हैं। ऐसे में यदि हमास वास्तव में हथियार छोड़ता है, तो यह उसके इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा।हमास को लेकर फिलिस्तीनी समाज की क्या है सोंच
हमास को लेकर फिलिस्तीनी समाज की राय एक जैसी नहीं है। बहुत से लोग उसकी इस्लामी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी इजरायल के खिलाफ उसके प्रतिरोध को अपने राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा मानते हैं। उनका मानना है कि सशस्त्र प्रतिरोध ने फिलिस्तीन के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीवित रखा है। इसी वजह से हमास की लोकप्रियता केवल उसकी राजनीति नहीं, बल्कि इज़रायल के खिलाफ उसके रुख से भी जुड़ी है। अक्टूबर 2025 में पीपुल्स कंपनी फॉर पोल्स एंड सर्वे रिसर्च (PCPSR) के सर्वे के अनुसार 60 प्रतिशत फिलिस्तीनियों ने हमास के प्रदर्शन पर संतोष जताया था। वहीं 69 प्रतिशत लोगों ने गाजा में उसके निरस्त्रीकरण का विरोध किया था। वेस्ट बैंक में यह विरोध 87 प्रतिशत तक था। ऐसे में यदि हमास बिना किसी ठोस राजनीतिक उपलब्धि के हथियार छोड़ता है, तो उसे अपने समर्थकों के बीच नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अभी भी कितना ताकतवर है हमास?
इजरायल के लंबे सैन्य अभियान के कारण गाजा का बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका है। हजारों इमारतें ढह गई हैं और हमास की कई सैन्य संरचनाएं भी तबाह हुई हैं। इसके बावजूद माना जाता है कि उसके पास अभी भी कुछ हथियार, भूमिगत सुरंगें, गोला-बारूद के भंडार और सीमित सैन्य क्षमता मौजूद है। हालांकि, इसकी वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। समझौते के तहत हमास को केवल हथियार जमा नहीं करने होंगे, बल्कि हथियार बनाने वाली इकाइयों, सुरंगों और सैन्य ढांचे को भी समाप्त करना होगा।कौन करेगा निरस्त्रीकरण की निगरानी?
यही इस समझौते का सबसे अस्पष्ट हिस्सा है। अमेरिकी अधिकारियों ने केवल इतना कहा है कि एक तीसरी स्वतंत्र समिति पूरे निरस्त्रीकरण की निगरानी करेगी। लेकिन यह समिति किन देशों की होगी, उसके अधिकार क्या होंगे, वह हथियारों की जांच कैसे करेगी और यदि कोई पक्ष समझौता तोड़ता है तो क्या कार्रवाई होगी, इन सवालों के जवाब अभी सार्वजनिक नहीं हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन बिंदुओं पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक इस समझौते को लागू करना बेहद कठिन होगा।क्या हमास केवल गाजा में हथियार छोड़ेगा?
बता दें कि हमास की मौजूदगी केवल गाजा तक सीमित नहीं है। उसका विस्तार वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम तक है।ऐसे में अभी यह भी साफ नहीं है कि प्रस्तावित निरस्त्रीकरण केवल गाजा पर लागू होगा या अन्य क्षेत्रों पर भी। यदि गाजा में हथियार जमा हो जाते हैं लेकिन वेस्ट बैंक में गतिविधियां जारी रहती हैं, तो भविष्य में नए टकराव की संभावना बनी रहेगी।
इजरायल का क्या है कहना?
इस समझौते की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती इजरायल है।इजरायली अधिकारियों का कहना है कि जब तक हमास पूरी तरह हथियार नहीं छोड़ देता और गाजा पूरी तरह सैन्य गतिविधियों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक सेना वापस नहीं बुलाई जाएगी।
नए सैन्य ठिकानों की योजना क्यों विवादित है?
हाल ही में इज़रायल के दक्षिणपंथी नेताओं ने उत्तरी गाजा में तीन नए "नहल" आउटपोस्ट बनाने का प्रस्ताव रखा था। ये ऐसे सैन्य ठिकाने होते हैं, जहां सैनिकों के साथ कृषि और नागरिक गतिविधियां भी शुरू की जाती हैं। इतिहास को देखें तो पहले भी कई नहल आउटपोस्ट बाद में स्थायी इजरायली बस्तियों में बदल गए थे। ऐसे में अगर ऐसी योजनाएं आगे बढ़ती हैं, तो फिलिस्तीनी पक्ष के लिए यह भरोसा करना और मुश्किल हो जाएगा कि इजरायल वास्तव में गाजा छोड़ना चाहता है।ट्रंप की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी?
यह समझौता काफी हद तक अमेरिका की राजनीतिक ताकत पर निर्भर करेगा। यदि इजरायल किसी भी शर्त को मानने से इनकार करता है, तो ट्रंप प्रशासन को उस पर दबाव बनाना होगा। वहीं यदि हमास समझौते से पीछे हटता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी प्रतिक्रिया देनी होगी। अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यदि इजरायल शांति प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो ट्रंप इससे बेहद निराश होंगे। इससे यह भी संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन आने वाले समय में नेतन्याहू सरकार पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा सकता है।ट्रंप इस समझौते को ऐतिहासिक सफलता बता रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कहीं अधिक जटिल है। हमास के लिए हथियार छोड़ना उसकी विचारधारा और राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है, जबकि इज़रायल अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
