मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग पर पाकिस्तान का जन्म हुआ, लेकिन तब किसी ने ये नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब पाकिस्तान में मुसलमानों के बीच ही दुश्मनी शुरू हो जाएगी। सुन्नी बनाम शिया, देवबंदी बनाम बरेलवी, अहले-हदीस बनाम सूफी, और इन सबके बीच-राज्य, सेना, राजनीति और विदेशी हस्तक्षेप, पाकिस्तान में मुस्लिम गुटों के बीच टकराव कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है।
यह एक धीमी, परतदार और ऐतिहासिक प्रक्रिया का नतीजा है. कैसे? ऑन द स्पॉट के इस एपिसोड में आइए जानते हैं कि पाकिस्तान में मुसलमानों के बीच टकराव कैसे शुरू हुआ? और क्यों पाकिस्तान अब तक इस आग से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है?
शिया पाकिस्तान में अल्पसंख्यक
पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की कुल आबादी का करीब 95 से 97 फीसदी हिस्सा मुस्लिम है। कुल मुस्लिम आबादी में से 80 फीसद सुन्नी बताए जाते हैं। वहीं, शिया मुसलमानों की बात करें तो ये 20 फीसदी से बीच बताई जाती है। वैसे तो पाकिस्तान दुनिया में शिया मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश माना जाता है। लेकिन यहां शिया अल्पसंख्यक हैं।
मुस्लिमों के बीच पहला टकराव अहमदिया समुदाय को लेकर
हालांकि, पाकिस्तान में मुस्लिमों के बीच पहला टकराव अहमदिया समुदाय को लेकर हुआ था। ये साल 1953 में हुआ, पाकिस्तान के पंजाब दंगे भड़क गए। अहमदिया को गैर-मुस्लिम घोषित करने की मांग उठी। इस दौरान भयंकर दंगे हुए, फिर साल 1974 में पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार ने अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित करते हुए एक संवैधानिक संशोधन पेश किया था।
अहमदिया मुसलाम पाकिस्तान में डर के साए में ही जीने को मजबूर
इसके 10 साल बाद जिया-उल-हक के शासन के दौरान अहमदिया समुदाय पर और प्रतिबंध लगाते हुए एक कानूनी अध्यादेश लागू किया गया और अहमदिया को खुद को मुसलमान बताने को अपराध घोषित कर दिया गया। मौजूदा समय में भी अहमदिया मुसलाम पाकिस्तान में डर के साए में ही जीने को मजबूर हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान में जिया-उल-हक के शासन के दौरान ही मुस्लिमों के अलग-अलग समुदायों के बीच बड़े पैमाने पर टकराव शुरू हुए। ये टकराव खासतौर से से उनके कट्टरपंथी 'इस्लामीकरण' नीतियों, देवबंदी विचारधारा को बढ़ावा देने और शिया-सुन्नी मतभेदों के राजनीतिकरण के कारण बढ़ा।
शिया और सुन्नी के बीच हिंसा की जड़ें साल 1979 में है
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि शिया और सुन्नी के बीच हिंसा की जड़ें साल 1979 में है, जब जनरल ज़िया-उल-हक़ ने अपने सैन्य शासन को वैध ठहराने के लिए पाकिस्तानी राजनीति का 'इस्लामीकरण' शुरू किया। सुन्नी संगठनों ने पाकिस्तान में शिया मुसलमानों पर हमले शुरू कर दिए। शिया उग्रवाद के बढ़ने से तहरीक-ए-जाफरिया जैसे संगठनों का गठन हुआ, जिन पर सुन्नियों के खिलाफ जवाबी हमले करने के आरोप लगे। जब सांप्रदायिक हमलों में पाकिस्तान दशकों तक झुलसता रहा।
कई और कट्टर संगठन सामने आने लगे
समय के साथ कई और कट्टर संगठन सामने आने लगे। पाकिस्तानी सरकार कभी रणनीतिक मजबूरी तो कभी राजनीतिक सौदेबाजी के लिए इन संगठनों का इस्तेमाल करती रही। पाकिस्तानी सरकार इस आग को पूरी तरह बुझाने के बजाय उसकी दिशा बदलने की कोशिश करती रही है।
