95 Million Year Old Dinosaur: सहारा रेगिस्तान की तपती रेत के नीचे वैज्ञानिकों को एक बेहद खास खोज मिली है। जीवाश्म वैज्ञानिकों ने यहां एक नई डायनासोर प्रजाति के जीवाश्म खोजे हैं, जिसका नाम स्पिनोसॉरस मिराबिलिस रखा गया है। माना जा रहा है कि यह विशाल डायनासोर लगभग 95 मिलियन वर्ष पहले पृथ्वी पर रहता था। उस समय आज का सूखा सहारा रेगिस्तान नदियों, झीलों और घने जंगलों से भरा हुआ इलाका हुआ करता था। यह खोज नाइजर के सहारा क्षेत्र में स्थित एक दूरस्थ जगह जेंग्युबी में हुई। वैज्ञानिकों को इसके जीवाश्म पहली बार साल 2019 में मिले थे।
डायनासोर की लंबाई लगभग एक स्कूल बस जितनी
इसके बाद 2022 में हुई खुदाई के दौरान और भी महत्वपूर्ण अवशेष सामने आए। इनमें सबसे खास इसकी खोपड़ी थी, जिसके ऊपर तलवार के आकार की एक बड़ी शिखा दिखाई दी। यही इसकी सबसे अनोखी पहचान मानी जा रही है। इस शोध का नेतृत्व शिकागो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पॉल सेरेनो ने किया। उन्होंने बताया कि जब उनकी टीम ने कंप्यूटर पर इस डायनासोर की 3डी खोपड़ी का मॉडल तैयार किया, तो वह पल सभी के लिए बेहद रोमांचक था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह डायनासोर आकार में बहुत बड़ा था। इसकी लंबाई लगभग एक स्कूल बस जितनी मानी जा रही है और इसका वजन भी कई टन रहा होगा।
बनावट आज के मगरमच्छों से मिलती-जुलती
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह डायनासोर नदियों और मीठे पानी के इलाकों में शिकार करता था। इसका लंबा थूथन और नुकीले, एक-दूसरे में फंसे हुए दांत मछलियों को पकड़ने के लिए बिल्कुल सही थे। इसकी बनावट आज के मगरमच्छों से मिलती-जुलती थी, जिससे यह फिसलन भरी मछलियों को आसानी से पकड़ सकता था। पॉल सेरेनो ने इस डायनासोर को मजाकिया अंदाज में 'नरक का बगुला' कहा है। उनका मानना है कि यह मजबूत पैरों के सहारे पानी में खड़ा होकर शिकार करता होगा। यह करीब दो मीटर गहरे पानी में भी आराम से रह सकता था, लेकिन शायद यह ज्यादा समय उथले पानी में ही बिताता था।
यह खोज इसलिए भी खास है क्योंकि स्पिनोसॉरिड डायनासोरों को लेकर वैज्ञानिकों के बीच लंबे समय से बहस चलती रही है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अच्छे तैराक थे, जबकि कुछ का कहना है कि ये सिर्फ नदी किनारे शिकार करते थे। नई खोज ने इस बहस में एक नया पहलू जोड़ दिया है।वैज्ञानिकों का कहना है कि सहारा के इस इलाके से और भी कई डायनासोर के जीवाश्म मिले हैं। हर नई खोज हमें उस प्राचीन दुनिया को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है, जो लाखों साल पहले पृथ्वी पर मौजूद थी।
