New Labour Code: आम तौर पर किसी भी संस्थान में लगातार 5 साल की नौकरी पूरी करने के बाद ग्रेच्युटी मिलती है, लेकिन अब 1 साल की नौकरी करने पर भी कर्मचारी को ग्रेच्युटी मिलेगी। दरअसल, केंद्र सरकार ने शुक्रवार को श्रम कानून में बड़े बदलाव और सुधार की घोषणा की। सरकार ने चार नए लेबर कोड यानी श्रम संहिताओं को नोटिफाई किया है। ये चार नए संहिता, मजदूरी संहिता-2019, औद्दोगिक संबंध संहिता-2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता-2020, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तें संहिता-2020 हैं।
सरकार ने साफ कर दिया है कि फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों (FTE) को पांच साल का इंतार नहीं करना होगा और महज एक साल काम करने के बाद ही ग्रेच्युटी का फायदा मिल सकेगा।
नए नियमों में मुताबिक, Fixed-Term Employees को पर्मानेंट एंप्लाई से जुड़े सभी तरह के फायदे मिलेंगे, जिनमें छुट्टी से लेकर मेडिकल और सोशल सिक्योरिटी तक शामिल हैं। इन कर्मचारियों को भी पर्मानेंट स्टाफ के बराबर सैलरी मिलेगी और अन्य लाभ भी मिलेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि जो कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर काम की संख्या घटे और डायरेक्ट हायरिंग को बढ़ावा मिले।
क्या होती है ग्रेच्युटी?
ग्रेच्युटी वह रकम है जो कंपनी अपने कर्मचारी को कई साल की नौकरी के बाद धन्यवाद के तौर पर देती है। यानी आपने लंबे समय तक कंपनी के लिए मेहनत की, तो कंपनी आपको नौकरी छोड़ते समय, रिटायर होते समय या किसी दुखद घटना में एकमुश्त पैसा देती है। सामान्य नियम यह है कि कम से कम पांच साल लगातार काम करने के बाद ही ग्रेच्युटी मिलती है, लेकिन मौत या दुर्घटना के मामलों में यह शर्त नहीं होती।
इस पैसे की गणना भी एक तय तरीके से होती है। इसमें आपकी बेसिक सैलरी और डीए के आधार पर 15 दिन का वेतन निकाला जाता है, फिर उसे आपने जितने साल काम किया है, उससे गुणा किया जाता है। जैसे, यदि किसी का बेसिक + डीए 26,000 रुपये है और उसने 10 साल नौकरी की है, तो उसकी ग्रेच्युटी लगभग 1,50,000 रुपये बनती है। यही रकम कंपनी उसे अंतिम भुगतान के रूप में देती है। यह पूरी व्यवस्था इसलिए है ताकि कर्मचारी को सेवा के अंत में कुछ आर्थिक सहारा मिल सके।

केंद्र सरकार ने श्रम कानून में किए बड़े बदलाव।(फोटो सोर्स: iStock)
चारों संहिता को विस्तार से समझिए
1. मजदूरी संहिता, 2019
- यह संहिता देश में मजदूरी से जुड़े सभी कानूनों को एक जगह लाती है। पहले वेतन, न्यूनतम मजदूरी और बोनस के लिए अलग-अलग कानून थे। अब सभी नियम एक ही फ्रेमवर्क में काम करते हैं।
- पूरे देश में न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को मिलता है, जिससे राज्यों के बीच भेदभाव कम होता है। सभी सेक्टरों के कर्मचारियों को, चाहे ऑर्गेनाइज्ड हों या अनऑर्गेनाइज्ड, समान न्यूनतम मजदूरी का अधिकार।
- वेतन का भुगतान समय पर और पारदर्शी तरीके से करना अनिवार्य। ओवरटाइम और बोनस से जुड़े नियम एकसमान बनाए गए।
2. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020
- यह संहिता कंपनियों और कर्मचारियों के बीच रोजगार, हड़ताल, यूनियन, छंटनी और कार्यस्थल के विवादों को नियंत्रित करती है।
- यह संहिता कामगार संगठनों (ट्रेड यूनियंस) को मान्यता देने के नियम तय किए गए। हड़ताल के लिए कर्मचारियों को 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य, जिससे उद्योगों में अचानक ठप होने की स्थिति न बने।
- 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को भर्ती और छंटनी में ज्यादा लचीलापन। उद्योग और कामगारों के बीच विवाद सुलझाने के लिए नए "रेस्क्यू मैकेनिज्म" बनाए गए।
3. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020
- यह संहिता श्रमिकों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा योजनाओं (PF, ESI, मातृत्व लाभ, बीमा, पेंशन, ग्रेच्युटी) को एक प्लेटफार्म पर लाती है।
- PF, ESI और अन्य लाभ गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स (जैसे Zomato, Swiggy, Uber आदि) तक भी बढ़ाए गए। इस संहिता के तहत सभी कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का दायरा आसान और स्पष्ट किया गया।
- रजिस्टर्ड कर्मियों को आर्थिक सहायता, बीमा, दुर्घटना लाभ और मातृत्व लाभ उपलब्ध कराना अनिवार्य किया गया। सरकार ने सामाजिक सुरक्षा फंड बनाने की भी व्यवस्था की है।
4. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तें संहिता, 2020
- यह संहिता फैक्ट्रियों, खदानों, वेयरहाउस, कंस्ट्रक्शन साइट्स और बड़े संस्थानों में सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल सुनिश्चित करती है।
- इस संहिता के तहत कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों को आधुनिक बनाया गया। खतरनाक उद्योगों में काम करने वालों के लिए स्वास्थ्य परीक्षण और सुरक्षा उपकरण अनिवार्य।
- महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति, लेकिन सुरक्षा प्रबंध आवश्यक। साफ-सफाई, रोशनी, बैठने की सुविधा, पीने का पानी, शौचालय जैसी सुविधाएं अनिवार्य की गईं। बड़े प्रतिष्ठानों में कार्यस्थल दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग अब सख्त और अनिवार्य बन जाएगा।
क्या है इन चारों श्रम संहिताओं का उद्देश्य?
- नियमों को सरल बनाना।
- कर्मचारियों को अधिक सुरक्षा देना।
- उद्योगों के संचालन को आसान करना।
- और श्रमिक-नियोक्ता संबंधों को पारदर्शी बनाना।
