No Cost EMI: आपने ऑनलाइन शॉपिंग और बड़े इलेक्ट्रॉनिक स्टोर्स पर "नो कॉस्ट EMI" का ऑफर खूब देखा होगा। इसको लेकर दावा किया जाता है कि ग्राहक को बिना ब्याज के आसान किस्तों में सामान मिलेगा। लेकिन असलियत में इसमें कई छिपे हुए चार्जेज और ट्रिक्स छिपे होते हैं, जिनके चलते ग्राहक अक्सर ज्यादा पैसे चुका देता है। यहां हम नो कॉस्ट ईएमआई के बारे में डिटेल में बता रहे हैं।
'नो कॉस्ट EMI' का मतलब
नो कॉस्ट EMI का मतलब होता है कि ग्राहक से ब्याज नहीं लिया जाएगा। लेकिन बैंक और NBFC इस ऑफर को सीधे नहीं देते, बल्कि कंपनियां प्रोडक्ट की कीमत में हेरफेर करके ब्याज को पहले ही एडजस्ट कर देती हैं। या फिर प्रोसेसिंग फीस के रूप में ब्याज लिया जा सकता है। यानी ब्याज दिखता नहीं है, पर वसूला जरूर जाता है।
कैसे काम करता है यह मॉडल
अधिकतर मामलों में रिटेलर प्रोडक्ट की MRP पर डिस्काउंट देने के बजाय उसी रकम को EMI ब्याज चुकाने में लगा देता है। ग्राहक को लगता है कि उसने 0% ब्याज पर प्रोडक्ट खरीदा है, लेकिन असलियत में वह डिस्काउंट खो चुका होता है। इसके अलावा यदि ग्राहक किस्त देने में जरा भी देर करता है तो उससे भारी पेनाल्टी वसूली जाती है।
प्रोसेसिंग फीस और हिडन चार्जेज
कई बार "नो कॉस्ट EMI" पर प्रोसेसिंग फीस, GST और कार्ड चार्जेज अलग से जोड़े जाते हैं। ऐसे में वास्तविक कीमत बढ़ जाती है और ग्राहक को पता ही नहीं चलता कि वह ब्याज के बराबर या उससे ज्यादा भुगतान कर रहा है।
क्रेडिट कार्ड और NBFC की भूमिका
यह ऑफर मुख्य रूप से क्रेडिट कार्ड EMI या NBFC लोन के जरिए दिया जाता है। कार्ड कंपनियां और फाइनेंसर ब्याज न लेने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनकी कमाई रिटेलर से वसूले गए मार्जिन और चार्जेज से होती है।
ग्राहकों को क्या करना चाहिए
खरीदारी से पहले हमेशा प्रोडक्ट की कैश प्राइस और EMI प्राइस की तुलना करें। ऑफर में छिपे हुए प्रोसेसिंग चार्ज, GST और मिसिंग डिस्काउंट की जानकारी जरूर देखें। तभी तय करें कि EMI लेना फायदेमंद है या नकद खरीदना।
