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Builder vs Buyer Dispute : RERA में दर्ज कराएं ऑनलाइन शिकायत, जानें स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस और अपने अधिकार

अगर आप घर खरीद रहे हैं, या खरीद चुके हैं तो एक बायर के तौर पर आपके क्या अधिकारी हैं यह जानना बेहद जरूरी है। इसके अलावा कैसे आप बिल्डर के खिलाफ ऑनलाइन रेरा को शिकायत दे सकते हैं।

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बिल्डर के खिलाफ बायर को मिलते हैं कई अधिकार

How to File Complaint in RERA : घर खरीदना किसी के लिए सिर्फ एक बड़ सपने को पूरा करना ही नहीं होता है। बल्कि, यह जीवन के सबसे बड़े वित्तीय और भावनात्मक फैसलों में भी एक होता है। लेकिन, कई बार यह ख्वाब बुरा सपना बन जाता है और ऐसे फैसले में तब्दील हो जाता है, जो पूरे जीवन पर असर डालता है। खासतौर पर बड़े शहरों में ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में फ्लैट खरीदना तब भारी पड़ जाता है, जब बिल्डर की तरफ से गड़बड़ी होने लगती है। लिहाजा, अगर आप भी घर खरीदने जा रहे हैं या खरीद चुके हैं, तो अपने उन अधिकारों को जरूर जान लें, जिनकी मदद से आप बिल्डर की मनमानी से बच सकते हैं।

रेरा से मिलेगी सुरक्षा

अगर आपका बिल्डर या रियल एस्टेट एजेंट से कोई विवाद है, तो परेशान होने की जगह इस मामले को रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) तक लेकर जाएं। क्योंकि, एक घर खरीदार के तौर पर रेरा आपके अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे मजबूत कानूनी मंच है। रेरा अधिनियम, 2016 की धारा 31 के तहत कोई भी पीड़ित खरीदार बिल्डर के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। जानते हैं कि रेरा में शिकायत दर्ज कराने की पूरी ऑनलाइन प्रक्रिया।

क्या है स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस?

भले ही हर राज्य का अपना रेरा पोर्टल होता है। लेकिन, शिकायत दर्ज करने की ऑनलाइन प्रक्रिया एक जैसी ही होती है। इसके लिए आपको नीचे दिए गए स्टेप्स को फॉलो करना होगा।

पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन: सबसे जिस भी राज्य का मामला है उस राज्य की आधिकारिक रेरा वेबसाइट (जैसे UP RERA, MahaRERA, Delhi RERA आदि) पर जाएं। वहां, अपनी ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर के जरिये शिकायतकर्ता यानी 'Complainant' के तौर पर रजिस्ट्रेशन करें और लॉगिन आईडी-पासवर्ड बनाएं।

शिकायत सेक्शन में जाएं: लॉगिन करने के बाद 'File Complaint' या 'Grievance' सेक्शन पर क्लिक करें और मांगी गई डिटेल्स भर दें।

फीस का भुगतान: शिकायत दर्ज करने के बाद आपको तय सरकारी फीस जमा करानी होगी, जो अलग-अलग राज्यों में ₹1,000 से ₹5,000 तक हो सकती है। इसका भुगतान ऑनलाइन ही करना होता है।

रेफरेंस नंबर नोट करें: फीस के भुगतान के बाद आवेदन सबमिट होता है। इसके बाद एक Complaint Reference Number (CRN) मिलेगा। आपको इसे संभाल कर रखना होगा। इसी नंबर के जरिए आगे शिकायत का स्टेटस ट्रैक होगा।

फॉर्म एम और फॉर्म एन में क्या अंतर?

फॉर्म एम (Form M) : यह फॉर्म सीधे रेरा अथॉरिटी के पास दाखिल किया जाता है। इसका इस्तेमाल तब होता है, जब बिल्डर की तरफ से रेरा के किसी नियम का उल्लंघन किया जाए। मसलन प्रोजेक्ट की समय सीमा बढ़ाना, बिना बताए प्लान बदलना या प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन नहीं कराना।

फॉर्म एन (Form N): यह फॉर्म एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (Adjudicating Officer) के सामने दाखिल किया जाता है। इसका इस्तेमाल तब होता है, जब खरीदार बिल्डर की गलती के कारण हुए वित्तीय नुकसान के लिए मुआवजा (Compensation) या ब्याज की मांग करना चाहता है।

    RERA के तहत होमबायर्स के 5 सबसे बड़े अधिकार

    सूचना का अधिकार : खरीदार को प्रोजेक्ट के स्वीकृत प्लान, लेआउट, स्टेज-वाइज काम की प्रगति, बिजली-पानी की व्यवस्था जैसी हर छोटी-बड़ी जानकारी पाने का पूरा हक है। बिल्डर को ये सारी जानकारियां रेरा पोर्टल पर अपडेट करनी होती हैं।

    समय पर पजेशन का अधिकार : बिल्डर को 'बिल्डर-बायर एग्रीमेंट' में लिखी तारीख पर ही फ्लैट सौंपना होगा। यदि देरी होती है, तो खरीदार देरी की अवधि के लिए हर महीने ब्याज (Compensation) पाने का हकदार है।

    रिफंड और एग्जिट का अधिकार : अगर बिल्डर समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकल सकता है। ऐसी स्थिति में बिल्डर को खरीदार का पूरा पैसा ब्याज सहित वापस करना होगा।

    क्वालिटी कंस्ट्रक्शन की गारंटी : पजेशन मिलने के 5 साल के भीतर यदि घर में कोई स्ट्रक्चरल डिफेक्ट (बनावट की खराबी) या खराब कंस्ट्रक्शन की समस्या आती है, तो बिल्डर को 30 दिनों के भीतर उसे अपने खर्च पर मुफ्त में ठीक करना होगा।

    प्लान में बदलाव पर रोक : बिल्डर बिना खरीदारों की मर्जी के बिल्डिंग के स्वीकृत प्लान या लेआउट में कोई बदलाव नहीं कर सकता। इसके लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3) आवंटियों की लिखित सहमति अनिवार्य है।

    Yateendra Lawaniya
    यतींद्र लवानियाauthor

    प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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