UPI Fraud: डिजिटल भुगतान के इस दौर में यूपीआई हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फर्जी बैंक अधिकारी बनकर कॉल करना, नकली कस्टमर केयर नंबर, धोखाधड़ी वाले पेमेंट रिक्वेस्ट या स्क्रीन-शेयरिंग ऐप्स के जरिए स्कैमर्स चंद मिनटों में बैंक खाता खाली कर सकते हैं। कई बार लोगों को इसका पता तब चलता है जब उनके खाते से पैसे कट चुके होते हैं। हालांकि, यूपीआई फ्रॉड का शिकार होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि ग्राहक को पूरे नुकसान का खामियाजा खुद उठाना पड़ेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ग्राहकों को अनधिकृत (unauthorized) इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन से बचाने के लिए एक सख्त नियम और ढांचा तैयार किया है, जिसके तहत कुछ मामलों में ग्राहकों को 'जीरो लायबिलिटी' यानी शून्य नुकसान का लाभ भी मिल सकता है।
क्या बैंक को रिफंड देना होगा? जानिए आरबीआई के नियम
आरबीआई के नियमों के अनुसार, हर यूपीआई फ्रॉड को अनधिकृत ट्रांजैक्शन नहीं माना जाता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि फ्रॉड कैसे हुआ, क्या ग्राहक ने अपनी जानकारी शेयर की थी या पेमेंट खुद अप्रूव किया था और बैंक को कितनी जल्दी सूचना दी गई। अगर कोई अनधिकृत लेन-देन बैंक की अपनी लापरवाही, गलती या सिस्टम की कमी के कारण हुआ है, तो ग्राहक की देनदारी शून्य (Zero Liability) होती है। इसके लिए यह मायने नहीं रखता कि बैंक को कितने दिनों में सूचना दी गई। वहीं, अगर फ्रॉड किसी तीसरे पक्ष की सेंधमारी के कारण हुआ है और इसमें बैंक या ग्राहक दोनों की कोई गलती नहीं है, तो बैंक से सूचना मिलने के 3 कार्यदिवसों (working days) के भीतर शिकायत करने पर ग्राहक का नुकसान शून्य हो सकता है। जानकारों के मुताबिक, नियमों के तहत योग्य मामलों में बैंकों को 10 दिनों के भीतर प्रोविजनल क्रेडिट (अस्थाई राशि) देना होता है और 90 दिनों के अंदर शिकायत का निपटारा करना जरूरी है।
यूपीआई पिन शेयर किया या पेमेंट अप्रूव किया तो क्या होगा?
सबसे बड़ा पेंच तब फंसता है जब कोई ग्राहक खुद स्कैमर के झांसे में आकर अपना यूपीआई पिन दर्ज कर देता है या पेमेंट रिक्वेस्ट अप्रूव कर देता है। मान लीजिए कोई आपको बैंक अधिकारी बनकर कॉल करे और कहे कि खाते का वेरिफिकेशन कराना जरूरी है। अगर आप निर्देश मानकर अपना पिन डाल देते हैं, तो बैंक इसे 'ग्राहक द्वारा अधिकृत ट्रांजैक्शन' मान सकता है। साइबर सुरक्षा एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब कोई ग्राहक खुद अपनी मर्जी से पिन दर्ज करता है, ओटीपी शेयर करता है या फर्जी कलेक्ट रिक्वेस्ट स्वीकार करता है, तो इसे ग्राहक की लापरवाही माना जाता है। ऐसे मामलों में, बैंक को फ्रॉड की सूचना मिलने से पहले तक का नुकसान ग्राहक को उठाना पड़ सकता है, और रिपोर्ट मिलने के बाद का जोखिम बैंक का होता है। हालांकि, अगर यह साबित हो जाए कि सिस्टम फेलियर बैंक की तरफ से था, तो स्थिति बदल सकती है। इसलिए कभी भी पैसे पाने या कैशबैक के लिए अपना यूपीआई पिन दर्ज न करें, क्योंकि पिन केवल पैसे भेजने के लिए होता है।
'3-दिन का नियम' महत्वपूर्ण: कब शुरू होती है समय सीमा?
आरबीआई के नियमों के तहत 3 कार्यदिवसों के भीतर शिकायत दर्ज करना बेहद महत्वपूर्ण है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि तीसरे पक्ष के जरिए हुए फ्रॉड की समय रहते रिपोर्ट करने पर नुकसान से बचा जा सकता है। खास बात यह है कि यह समय सीमा फ्रॉड होने वाले दिन से नहीं, बल्कि ग्राहक को बैंक से इस अनधिकृत लेन-देन का संदेश मिलने की तारीख से शुरू होती है। संदेश मिलने के दिन को छोड़कर, बैंक की होम ब्रांच के कार्यदिवसों के अनुसार तीन दिन गिने जाते हैं। अगर इस अवधि में शिकायत कर दी जाए, तो कई मामलों में ग्राहक की देनदारी शून्य हो जाती है। बैंक खाते के प्रकार के आधार पर अधिकतम देनदारी तय होती है, जैसे बेसिक सेविंग्स अकाउंट के लिए 5,000 रुपये, अन्य निर्दिष्ट बचत खातों के लिए 10,000 रुपये और करंट या क्रेडिट खातों के लिए 25,000 रुपये तक हो सकती है। अगर रिपोर्ट करने में 7 दिन से अधिक की देरी होती है, तो फैसला बैंक की अपनी बोर्ड-स्वीकृत नीति के आधार पर होता है।
शुरुआती कुछ घंटों में क्या कदम उठाएं?
फ्रॉड का पता चलते ही तेजी दिखाना सबसे जरूरी है, क्योंकि स्कैमर ठगी की रकम को तुरंत कई खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। बैंक के आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करके तुरंत अनधिकृत ट्रांजैक्शन की सूचना दें और यूपीआई या खाते से जुड़ी अन्य सेवाओं को ब्लॉक करवाएं। ध्यान रखें कि कॉलर द्वारा दिए गए नंबर का इस्तेमाल करने के बजाय बैंक की ऑफिशियल वेबसाइट या डेबिट कार्ड पर छपे नंबर पर ही कॉल करें। साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें। जितनी जल्दी हो सके नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। इससे पुलिस तुरंत सक्रिय होकर संबंधित बैंक से संपर्क कर पैसे को आगे ट्रांसफर होने से रोक सकती है। यूपीआई ऐप पर शिकायत दर्ज करें। जिस ऐप (जैसे गूगल पे, फोनपे आदि) से पेमेंट हुआ है, उसके डिस्प्यूट या कंप्लेंट सेक्शन में जाकर शिकायत दर्ज करें और उसका रेफ्रेंस नंबर अपने पास सुरक्षित रख लें। लिखित शिकायत और सबूत संभाल कर रखें। बैंक को लिखित शिकायत दें और उसकी रसीद लें। इसके अलावा यूपीआई ट्रांजैक्शन आईडी, बैंक स्टेटमेंट, एसएमएस अलर्ट, स्क्रीनशॉट और स्कैमर के साथ हुई चैट या कॉल रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखें।
बैंक ने शिकायत ठुकरा दी तो क्या करें?
अगर बैंक आपकी शिकायत खारिज कर देता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। सबसे पहले बैंक से लिखित में कारण मांगें और जांच रिपोर्ट तथा ऑथेंटिकेशन रिकॉर्ड की मांग करें। इसके बाद मामले को बैंक के मुख्य नोडल अधिकारी के पास आगे बढ़ाएं। अगर बैंक 30 दिनों के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं देता है, तो आप आरबीआई इंटीग्रेटेड ओंबड्समैन स्कीम, 2021 के तहत आधिकारिक वेबसाइट cms.rbi.org.in पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह शिकायत आमतौर पर बैंक के जवाब मिलने के एक साल के भीतर दर्ज की जानी चाहिए। सही सबूत और समय पर उठाए गए कदम आपकी रकम वापस दिलाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
