Social Media Platforms Accountability : फेसबुक, इंस्टाग्राम और X जैसी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भारत में काम करने के नियम बदल सकते हैं। केंद्र सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा यानी 'सेफ हार्बर प्रोटेक्शन' की समीक्षा करने पर विचार कर रही है।
सरकार का मानना है कि जब कोई प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम से तय करता है कि यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाना है, किस पोस्ट को प्रमोट करना है और किसकी पहुंच सीमित करनी है, तो उसे केवल कंटेंट पहुंचाने वाला माध्यम नहीं माना जा सकता।
ऐसे में कंटेंट को प्रमोट करने में उसकी भूमिका के लिए भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। Business Standard की रिपोर्ट के मुताबिक, यह चर्चा अभी शुरुआती चरण में है। प्रस्ताव को लागू करने के लिए Information Technology (IT) Act, 2000 में संशोधन करना पड़ सकता है। सरकार को इस विषय पर कुछ सुझाव और कानूनी राय मिली हैं, जिनका अध्ययन किया जा रहा है।
क्या है सेफ हार्बर प्रोटेक्शन?
IT Act की धारा 79 के तहत सोशल मीडिया और दूसरे इंटरनेट मध्यस्थों (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) को यूजर्स की ओर से पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सामान्य तौर पर कानूनी सुरक्षा मिलती है। यानी किसी यूजर के गैरकानूनी पोस्ट के लिए प्लेटफॉर्म को अपने आप जिम्मेदार नहीं माना जाता।
हालांकि, यह सुरक्षा बिना शर्त नहीं है। कंपनियों को सरकार की ओर से तय नियमों का पालन करना होता है। उन्हें गैरकानूनी कंटेंट की जानकारी मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करनी होती है। अगर कोई प्लेटफॉर्म खुद गैरकानूनी गतिविधि में मदद करता है या वैध सरकारी नोटिस अथवा अदालत के आदेश के बावजूद संबंधित कंटेंट नहीं हटाता, तो उसकी कानूनी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
गलत कंटेंट दिखा तो कौन होगा जिम्मेदार?
सरकार की चिंता सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को लेकर है। ये एल्गोरिदम यूजर की पसंद और गतिविधियों के आधार पर वीडियो और पोस्ट रिकमेंड करते हैं। ऐसे में अगर किसी नाबालिग को अश्लील या उम्र के लिहाज से अनुचित कंटेंट दिखाया जाता है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
सरकारी अधिकारियों का सवाल है कि जब प्लेटफॉर्म खुद तय करता है कि यूजर को क्या दिखाना है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह कैसे बच सकता है? हालांकि, सरकार का प्रस्ताव एल्गोरिदम से कंटेंट प्रमोट करने पर रोक लगाने का नहीं, बल्कि इससे जुड़ी कंपनियों की जवाबदेही तय करने का है।
किन प्लेटफॉर्म को मिल सकती है छूट?
प्रस्ताव के मुताबिक, ऐसे पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को राहत मिल सकती है, जो केवल एक यूजर का संदेश दूसरे तक पहुंचाते हैं और कंटेंट में हस्तक्षेप नहीं करते। हालांकि, किन सेवाओं को इस छूट में शामिल किया जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
डीपफेक की शिकायत पर सीधे हटेगा कंटेंट?
सरकार एक ऐसी व्यवस्था पर भी विचार कर रही है, जिसमें किसी व्यक्ति की डीपफेक तस्वीर, वीडियो या बिना सहमति साझा की गई निजी तस्वीरों के मामले में पीड़ित सीधे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने की मांग कर सकेगा।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। IT Act में संशोधन से पहले संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया जा सकता है। अगर यह बदलाव लागू होता है, तो सोशल मीडिया कंपनियों को अपने कंटेंट मॉडरेशन, रिकमेंडेशन सिस्टम और शिकायत निपटान व्यवस्था को लेकर अधिक जवाबदेह होना पड़ सकता है।
