स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने मेंस के हेवीवेट वर्ग में 190 किग्रा भार उठाकर कांस्य पदक जीता और राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारत का पहला पदक दिलाया। आज झंडू कुमार का नाम पूरी दुनिया में मशहूर हो गया, लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब कुमार को परिवार के पालन पोषण के लिए ई-रिक्शा और सब्जी बेचनी पड़ी थी।
साल 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान बिहार के झंडू कुमार ने गुजारा करने और परिवार की मदद के लिए ई-रिक्शा चलाया। इसके पहले वह नालंदा जिले के हरनौत बाजार में सब्जी की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां ओवरब्रिज बनने की वजह से उन्हें दुकान बंद करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा चलाया। हालांकि, इन मुश्किल समय में भी कुमार ने खेलने का सपना नहीं छोड़ा। आर्थिक तंगी और पांच साल की उम्र से पोलियो से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने पैरा और एबल-बॉडी पावरलिफ्टिंग दोनों में स्टेट और नेशनल लेवल पर मेडल जीतकर अपने सपने को जिंदा रखा।
सब्जी बेचकर चलाया परिवार
झंडू कुमार ने ग्लासगो से टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा, मैं हर दिन सब्जी खरीदने के लिए बिहार शरीफ तक लगभग 20 किमी का सफर करता था, उन्हें वापस लाता था और बाजार में बेचता था। शाम को लगभग 4 बजे काम खत्म करने के बाद, मैं ट्रेनिंग के लिए जिम जाता था।
रॉकस्टार जिम में गौतम सिंह की देखरेख में ट्रेनिंग करते हुए वह हर दिन इसी रूटीन को फॉलो करते थे। हालांकि, जो पैसे वह कमाते थे, वे शायद ही उनकी डाइट की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी होते थे।
डाइट और ट्रेनिंग के लिए नहीं थे पैसे
29 साल के कुमार ने याद करते हुए कहा, मैं अपने काम से दिन में सिर्फ 400-500 रुपये कमा पाता था, जबकि अकेले प्रोटीन सप्लीमेंट का खर्च लगभग 1,000 आता था। अपनी डाइट और ट्रेनिंग को मैनेज करना एक बड़ी चुनौती थी।
ई-रिक्शा चलाना शुरू करने के बाद हालात और मुश्किल हो गए। हालांकि, इससे उन्हें रेगुलर कमाई होती थी, लेकिन लंबे समय तक काम करने के कारण वह इतने थक जाते थे कि ठीक से ट्रेनिंग नहीं कर पाते थे। जब परिवार सब्जी की दुकान को फिर से खोलने में कामयाब हुआ, तो उन्होंने अपने खेल के सपने को जिंदा रखने के लिए एक और कुर्बानी दी।
कुमार ने कहा, मैंने नेशनल पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए 2023 में अपना ई-रिक्शा बेच दिया। यह एक बहुत बड़ा दांव था और शुरू में लगा कि यह उल्टा पड़ गया है।
कोच राजिंदर सिंह ने बदली जिंदगी
नई दिल्ली में हुई प्रतियोगिता में वह कोई भी लिफ्ट सफलतापूर्वक नहीं कर पाए। लेकिन उनके पक्के इरादे ने पैरा पावरलिफ्टिंग कोच राजिंदर सिंह राहेलू का ध्यान खींचा, जिन्होंने उन्हें गांधीनगर में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में ट्रेनिंग के लिए बुलाया।
यह उनके लिए वह बड़ा मौका साबित हुआ जिसकी उन्हें बहुत जरूरत थी। उसी साल बाद में, उन्होंने नई दिल्ली में हुए पहले खेलो इंडिया पैरा गेम्स में सिल्वर मेडल जीता। तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीते, जिसमें इस साल अप्रैल में बैंकॉक में हुई एशिया-ओशिनिया ओपन पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जीता गया ब्रॉन्ज मेडल भी शामिल है।
उन्होंने 191 किग्रा वजन उठाकर पोडियम पर जगह बनाई, जिससे कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए उनका क्वालिफिकेशन भी पक्का हो गया। इन उपलब्धियों के अलावा, उनके नाम 72 किग्रा कैटेगरी में 206 किग्रा वजन उठाने का नेशनल रिकॉर्ड भी है।
मेडल जीतकर बनाया नाम
अब अपने करियर की सबसे बड़ी प्रतियोगिता में मेडल जीतने पर झंडू कुमार ने उन लोगों को इसका श्रेय देते हैं जो उनके सफर के सबसे मुश्किल दौर में उनके साथ खड़े रहे, जिनमें उनके भाई कुंदन भी शामिल हैं। कॉमनवेल्थ में पहुंचना ही कुमार के लिए एक बड़ी सफलता थी, जिसने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। अब मेडल जीतकर अपने इस मुश्किल सफर को शानदार मोड़ दे दिया है।
