दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट को बड़ी राहत देते हुए 30 और 31 मई 2026 को होने वाले एशियन गेम्स चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि मातृत्व किसी महिला एथलीट के खिलाफ भेदभाव या बहिष्कार का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि महिला खिलाड़ियों के लिए असाधारण शारीरिक चुनौतियों से भरी होती है, लेकिन संस्थागत खेल ढांचे में इन चुनौतियों को अक्सर पर्याप्त संवेदनशीलता के साथ नहीं देखा जाता।
क्या है विनेश फोगाट के ट्रायल का पूरा मामला?
दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 22 मई 2026 को यह आदेश दिया। मामला उस चयन नीति से जुड़ा था, जिसके तहत एशियन गेम्स 2026 के ट्रायल में केवल उन्हीं खिलाड़ियों को हिस्सा लेने की अनुमति थी, जिन्होंने 2025 और 2026 की कुछ निर्धारित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते हों। विनेश फोगाट ने इस नीति को चुनौती देते हुए कहा कि वह मातृत्व अवकाश और प्रेग्नेन्सी की रिकवरी के कारण उन प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले सकीं। इसलिए यह नीति व्यवहारिक रूप से उन्हें ट्रायल से बाहर कर रही है।
विनेश फोगाट ने कोर्ट में क्या दलील दी?
विनेश फोगाट की ओर से वरिष्ठ वकील ने अदालत में कहा कि वह कोई विशेष छूट या सीधा चयन नहीं मांग रहीं, बल्कि सिर्फ ट्रायल में भाग लेने का अवसर चाहती हैं ताकि मेरिट के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। याचिका में कहा गया कि
1.विनेश ने दिसंबर 2024 में इंटरनेशनल टेस्टिंग एजेंसी (ITA) को सूचित किया था कि वह गर्भावस्था के कारण अगस्त 2025 तक खेल से अस्थायी ब्रेक लेंगी।
2.जुलाई 2025 में उन्होंने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया।
3.बाद में उन्होंने वापसी की प्रक्रिया पूरी की और ITA ने उन्हें 1 जनवरी 2026 से प्रतियोगिता के लिए पात्र भी घोषित कर दिया था।
4.लेकिन WFI की चयन नीति में मातृत्व अवकाश जैसी परिस्थितियों के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी।
कोर्ट में कौन से कानूनी मुद्दों को बनाया गया आधार?
विनेश फोगाट ने अदालत में तर्क दिया कि चयन नीति संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह समानता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के खिलाफ है। याचिका में कहा गया कि मातृत्व के कारण खेल से अस्थायी दूरी को खिलाड़ी के खिलाफ “डिसेबलिंग फैक्टर” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे महिला खिलाड़ियों के साथ भेदभावपूर्ण स्थिति पैदा हो रही है।
विनेश की ओर से यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों जैसे BWF, WTA, ITTF और WKF में गर्भावस्था और मातृत्व को ध्यान में रखते हुए ‘प्रोटेक्टेड रैंकिंग’ और खेल में वापसी की विशेष व्यवस्था होती है, लेकिन भारत कुश्ती महासंघ (WFI) की नीति में ऐसी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई।
विनेश के चयन को लेकर WFI पर क्या आरोप लगे?
याचिका में विनेश ने WFI पर “बहिष्कारकारी” और “मनमानी” नीति बनाने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा, विनेश फोगाट ने WFI के उस कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) को भी चुनौती दी, जिसमें पेरिस ओलंपिक 2024 के वेट-इन विवाद को लेकर उनसे जवाब मांगा गया था। याचिका में कहा गया कि .यह मुद्दा पहले ही कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट (CAS) में तय हो चुका है। CAS ने साफ कहा था कि विनेश की ओर से कोई गलत काम नहीं हुआ था। .इसके बावजूद WFI ने उन्हें “राष्ट्रीय शर्मिंदगी” बताने वाली टिप्पणी की।
WFI के खिलाफ कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने WFI की भाषा और रवैये पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने पूर्व बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के साथ पेरिस ओलंपिक में हुए प्रकरण को “राष्ट्रीय शर्मिंदगी” कहना बेहद निंदनीय है। कोर्ट ने कहा: “ऐसी टिप्पणियां बदले की भावना मानसिकता को दर्शाती हैं और प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती हैं।” अदालत ने यह भी कहा कि CAS पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि विनेश की ओर से कोई गलत आचरण नहीं था, इसलिए इस तरह के आरोप अनुचित और पूर्वनियोजित लगते हैं।
मातृत्व को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में मातृत्व पर विस्तृत टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा: मातृत्व को कभी भी “अयोग्यता” नहीं माना जा सकता। महिला खिलाड़ियों को गर्भावस्था और प्रसव के दौरान गंभीर शारीरिक चुनौतियों से गुजरना पड़ता है। कानून और संस्थागत ढांचे की जिम्मेदारी है कि मातृत्व महिला खिलाड़ियों के बहिष्कार या हाशियाकरण का कारण न बने। मातृत्व अवकाश के कारण किसी महिला के करियर, रैंकिंग या पेशेवर अवसरों को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
कोर्ट ने माना कि विनेश फोगाट की अनुपस्थिति सीधे तौर पर उनके मातृत्व अवकाश और रिकवरी से जुड़ी थी और यही वजह रही कि वह उन प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले सकीं, जिन्हें ट्रायल की पात्रता के लिए जरूरी बनाया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट ने चयन नीति पर क्या कहा?
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि WFI की चयन नीति “मनमानी” और “भेदभावपूर्ण” प्रतीत होती है, क्योंकि यह केवल 2025 और 2026 के पदक विजेताओं तक ही ट्रायल की पात्रता सीमित करती है। अदालत ने यह भी कहा कि पहले WFI के पास “आइकॉनिक खिलाड़ियों” को विशेष अनुमति देने का विवेकाधिकार था, लेकिन नई नीति में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं रखी गई।
विनेश फोगाट को कोर्ट से मिली ये बड़ी राहत
दिल्ली हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि: विनेश फोगाट को 30 और 31 मई 2026 के एशियन गेम्स चयन ट्रायल में हिस्सा लेने दिया जाए।
ट्रायल की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाए। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) और इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) के दो स्वतंत्र पर्यवेक्षक ट्रायल की निगरानी करें और रिपोर्ट अदालत में जमा करें। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है और मुख्य याचिका पर फैसला बाद में होगा।
