पेरिस: फ्रांस की राजधानी पेरिस में चल रहे 33वें गीष्मकालीन खेलों में एक बड़ा विवाद गुरुवार को बॉक्सिंग रिंग में उठ खड़ा हुआ। जिसकी गूंज सोशल मीडिया में जमकर सुनाई दे रही है। गुरुवार को यह विवाद तब खड़ा हुआ जब महिला बॉक्सिंग के वेल्टरवेट मुकाबले में अल्जीरियाई मुक्केबाज इमाने खलीफ और इटली की एंजेला कारिनी का आमना सामना हुआ। लेकिन मुकाबला शुरू होने के 46वें सेकेंड में रुक गया। इटली की मुक्केबाज ने अपनी नाक में पंच लगने के बाद दर्द की शिकायत की और मैच बीच में छोड़ दिया।
क्यों हु्आ विवाद?
मामला अल्जीरिया की मुक्केबाज इमाने खलीफ से जुड़ा है। इमाने खलीफ ट्रांस जेंडर हैं और उन्हें पेरिस ओलंपिक में महिलाओं की स्पर्धा में भाग लेने की अनुमति दी गई है। साल 2023 में इमाने खलीफ को वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान जेंडर एलिजिबिलिटी मानदंडों को पूरा नहीं कर पाने की वजह से डिस्क्वालीफाई कर दिया गया था। फाइनल मुकाबले से पहले जांच में दावा किया गया कि उनके टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ा हुआ था। लेकिन पेरिस ओलंपिक में उन्हें खेलने की अनुमति जेंडर इक्वलिटी की वजह से मिल गई।
कारिनी की नाक में लगी चोट
इटली की मुक्केबाज एंजेला कारिनी के नाक पर खलीफ ने जोरदार पंच लगाया। जिसके बाद उन्होंने नाक में दर्ज की शिकायत की। 46 सेकेंड के मुकाबले के दौरान एंजेला का हेड गेयर भी दो बार हट गया। संभवत: उनकी नाक टूट गई और उन्होंने मैच छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने मैच के बाद खुद को जीता हुआ बताया। हालांकि मैच के बाद वो रोती हुई नजर आईं और खलीफ से हाथ भी नहीं मिलाया।
बॉयलॉजिकल मेल बनाम फीमेल
सोशल मीडिया में जो बहस चल रही है उसमें कहा जा रहा है कि एक बॉयलॉजिकल मेल खिलाड़ी को फीमेल बॉक्सर के खिलाफ क्यों उतरने दिया गया। उसके कोमोसोम पुरुषों वाले हैं और पहले जेंडर टेस्ट में असफल हो चुकी है। ऐसे में सोशल मीडिया पर महिलाओं के खेल में पुरुषों का क्या काम को लेकर बहस चलने लगी। जांच में दावा किया गया कि उनके टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ा हुआ था. #IStandwithAngelaVCarni टेंड करने लगा। इस मुहिम को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के मालिक एलन मस्क का समर्थन भी मिल गया।
1940 में हुई खेलों में सेक्स वेरीफिकेशन की शुरुआत
खेलों में सेक्स वेरिफिकेशन की शुरुआत 1940 में शुरू हुई थी। खिलाड़ियों को महिलाओं की स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए फिजीशियन द्वारा दिया गया फेमेनिटी सर्टिफिकेट्स (femininity certificates) देना जरूरी था। जिसमें विजुअल और फिजिकर इन्सपेक्शन, क्रोमोसोम की जांच और टेस्टोस्टोरोन के स्तर की जांच की जाती थी। ऐसा इसलिए किया गया जिससे कि इंटरसेक्स एथलीट और महिलाओं को स्पर्धा में भाग लेने वाले पुरुष खिलाड़ियों की पहचान करके उन्हें अलग किया जाए। पुरुषों की स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए ऐसी किसी जांच नहीं की जाती है। क्योंकि वहां किसी के भाग लेने से शारीरिक दक्षता या बल का फर्क नहीं पड़ता है।
कहां आती है परेशानी
खिलाड़ियों की कोमोसोम की जांच में परेशानी तब आती है जब खिलाड़ियों के शरीर की पहचान सामान्य तौर पर पुरुष या महिला के रूप में नहीं की जा सकती है। उनके शरीर की सभी सेल्स में एक जैसा जीनोटाइप नहीं होता है या जेनेटिक एबनॉर्मलिटीज होती हैं। ऐसे में कोमोसोम की जगह हारमोन की जांच की जाने लगी। साल 2006 में लेकिन इस जांच को भी पूरी तरह पुख्ता नहीं कहा जा सकता। कुछ महिलाओं के शरीर में सामान्य तौर पर ही टेस्टेस्टोरेन का स्तर सामान्य से ज्यादा होता है ऐसे में उन्हें इस आधार पर भी बाहर नहीं किया जा सकता। कई तरह की जाचों के साझा आधार पर खेलों में सेक्स का फैसला होता है जो कई बार विवाद का विषय बनता है। ऐसा ही पेरिस ओलंपिक में भी हो रही है।
