अध्यात्म

कौन थे बरसाने वाले पद्मश्री रमेश बाबा? 16 साल की उम्र में छोड़ा घर, ब्रज को दे दिए 72 साल

Who Was Ramesh Baba : बरसाना के संत रमेश बाबा 6 अक्टूबर को निकुंज धाम प्रस्थान कर गए हैं। रमेशा बाबा सिर्फ एक संत नहीं बल्कि एक पर्यावरण संरक्षक भी थे। जिन्होंने ब्रज की विरासत को सलीके से संजोया है।

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बरसाने वाले रमेश बाबा कौन थे (Image AI Generated and Newsroom Verified)

Who Was Ramesh Baba : बरसाना के मान मंदिर से आने वाली घंटियों और हरिनाम संकीर्तन के बीच एक ऐसा नाम था, जिसे केवल संत कहकर पूरा नहीं किया जा सकता है। पद्मश्री से सम्मानित रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन राधारानी की भक्ति, गोसेवा और ब्रज की धरती की रक्षा के लिए लगा दिया। मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को उनके ब्रह्मलीन होने की खबर सामने आई तो बरसाना से लेकर पूरा ब्रज में शोक में डूब गया। मान मंदिर में उन्होंने अंतिम सांस ली। करीब सात दशक तक ब्रज में रहने वाले बाबा का जीवन साधना के साथ सेवा और संघर्ष की कहानी भी रहा।

उनकी पहचान सिर्फ एक संत के रूप में नहीं, बल्कि ब्रज की पहाड़ियों, जंगलों, कुंडों, यमुना और गोवंश के लिए आवाज उठाने वाले व्यक्ति के तौर पर भी बनी। उन्होंने जिस ब्रज को राधा-कृष्ण की लीला भूमि माना, उसकी प्रकृति और धार्मिक पहचान को बचाने के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया।

प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य थे पिता

रमेश बाबा का जन्म वर्ष 1938 में तीर्थराज प्रयाग में हुआ था। उनके पिता पंडित बलदेव प्रसाद शुक्ल प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य थे और माता का नाम हेमेश्वरी देवी था। मान मंदिर की जीवनी से जुड़ी जानकारी के अनुसार उनका जन्म पौष मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को दोपहर करीब 12 बजे हुआ था।

बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर था। प्रयाग में शिक्षा हासिल करने के साथ उन्हें संगीत में भी खास रुचि थी। उन्होंने पखावज, मृदंग, ढोलक और तबला जैसे वाद्य यंत्र सीखे थे। कम उम्र में ही उनके भीतर साधना और भक्ति के प्रति गहरी रुचि दिखाई देने लगी थी।

16 साल की उम्र में बरसाना आए और फिर लौटकर नहीं गए

रमेश बाबा के मन में बचपन से ही ब्रज आने की इच्छा थी। उन्होंने घर छोड़कर ब्रज आने की कोशिश भी की, लेकिन मां के प्रति लगाव उन्हें वापस ले आया। आखिरकार वर्ष 1954 में करीब 16 वर्ष की उम्र में वे बरसाना पहुंच गए और इसके बाद उनका जीवन यहीं का होकर रह गया। इससे पहले 1953 में भी वह ब्रज आए थे।

बरसाना आने के बाद उन्होंने संत प्रियाशरण जी महाराज का शिष्यत्व स्वीकार किया। शुरुआत में वह राधारानी मंदिर में मृदंग बजाते थे। धीरे-धीरे बरसाना और ब्रजभूमि उनकी साधना और सेवा का केंद्र बन गई। ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित मान मंदिर उनका प्रमुख साधना स्थल बना।

मानगढ़ की गुफा में की साधना

मान मंदिर से रमेश बाबा का रिश्ता सिर्फ किसी आश्रम के महंत का रिश्ता नहीं था। उन्होंने यहां लंबे समय तक एकांत साधना की। उनके बारे में बताया जाता है कि मानगढ़ की गुफा में भी उन्होंने साधना की थी।

उनका ब्रज से इतना गहरा लगाव था कि उन्होंने जीवन भर ब्रज की सीमा से बाहर नहीं जाने का संकल्प लिया। यही वजह थी कि 2019 में पद्मश्री मिलने के बाद भी वह दिल्ली जाकर सम्मान लेने नहीं गए। उनकी ओर से प्रतिनिधि ने राष्ट्रपति भवन में सम्मान ग्रहण किया और बाद में पद्मश्री का सम्मान बरसाना लाकर उन्हें सौंपा गया। उनके लिए ब्रज सिर्फ रहने की जगह नहीं था। राधारानी की भक्ति, ब्रज की मिट्टी और यहां की प्राकृतिक धरोहर उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।

ब्रज की पहाड़ियों और जंगलों के लिए शुरू किया आंदोलन

रमेश बाबा के जीवन का सबसे बड़ा पक्ष उनकी ब्रज संरक्षण की लड़ाई रहा। गहवरवन में पेड़ों की कटाई और ब्रज की पहाड़ियों में हो रहे अवैध खनन को लेकर उन्होंने आवाज उठाई।

उनका मानना था कि ब्रज की पहाड़ियां, वन, कुंड और यमुना केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि ब्रज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने खनन के खिलाफ आंदोलन चलाए और कई बार धरना-अनशन भी किया। इस संघर्ष के दौरान उन पर हमले की कोशिशों का भी जिक्र मिलता है। उनके लंबे अभियान के बाद वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रज की पहाड़ियों में अवैध खनन रोकने का आदेश दिया।

यमुना को लेकर भी सड़क पर उतरे

रमेश बाबा ने सिर्फ पहाड़ और जंगलों के लिए ही आवाज नहीं उठाई। यमुना की स्थिति को लेकर भी उन्होंने संतों और किसानों को साथ लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया। 2 मार्च 2011 को इलाहाबाद संगम से यमुना मुक्ति के लिए पदयात्रा शुरू हुई, जो दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंची। इस आंदोलन का उद्देश्य यमुना की अविरलता और उसके संरक्षण की मांग को मजबूती से उठाना था।

रमेश बाबा के लिए यमुना भी ब्रज की उसी विरासत का हिस्सा थी, जिसे वह बचाने में जुटे थे। इसी वजह से ब्रज संरक्षण का उनका अभियान केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति से भी जुड़ा रहा।

दो गायों से शुरू हुई गोसेवा की बड़ी कहानी

गोसेवा रमेश बाबा के जीवन का सबसे बड़ा सेवा कार्य बनकर सामने आई। वर्ष 2007 में माताजी गौशाला की शुरुआत दो गोवंश के साथ हुई। समय के साथ यह गोशाला बहुत बड़े सेवा केंद्र में बदल गई। हालिया रिपोर्टों में यहां करीब 60 से 65 हजार गोवंश की सेवा किए जाने की जानकारी दी गई है।

गौशाला के जरिए बेसहारा, बीमार और संरक्षण की जरूरत वाले गोवंश के लिए बड़े स्तर पर काम किया गया। गोसेवा के इस काम ने रमेश बाबा को ब्रज में एक अलग पहचान दी। यही वजह रही कि उनके सामाजिक और धार्मिक कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला।

जन-आस्था का बड़ा आयोजन बनी ब्रज चौरासी कोस यात्रा

रमेश बाबा का एक और बड़ा योगदान राधारानी ब्रजयात्रा से जुड़ा रहा। वर्ष 1968 में ब्रजवासियों के साथ ब्रज चौरासी कोस की यात्रा की परंपरा को आगे बढ़ाया गया। आज इस यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं और उनके रहने-खाने की व्यवस्था मान मंदिर से की जाती है। इस यात्रा ने ब्रज के धार्मिक स्थलों को आपस में जोड़ने के साथ यहां की परंपराओं और लोक संस्कृति को भी लोगों तक पहुंचाने का काम किया।

कुंडों और ब्रज की पुरानी धरोहरों के संरक्षण पर भी किया काम

रमेश बाबा ने ब्रज के पुराने कुंडों और धार्मिक स्थलों के संरक्षण पर भी काम किया। कामां और डीग क्षेत्र के कई कुंडों के जीर्णोद्धार से जुड़े कामों को भी किया। उनका प्रयास था कि ब्रज की पहचान सिर्फ मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि उससे जुड़े जंगल, पर्वत, जल स्रोत और पुराने तीर्थ भी सुरक्षित रहें। यही सोच आगे चलकर उनके पूरे सेवा कार्य की पहचान बनी।

तय कर दिया था उत्तराधिकारी

रमेश बाबा ने अपनी सेवाओं की आगे की जिम्मेदारी को लेकर भी पहले से व्यवस्था कर दी थी। मार्च 2024 में ब्रजशरण दास, जिन्हें राज बाबा के नाम से भी जाना जाता है, को अपना उत्तराधिकारी बनाया गया। संत समाज की मौजूदगी में उन्हें मान मंदिर की महंताई की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस व्यवस्था का मकसद यही था कि गोसेवा, ब्रज यात्रा, पर्यावरण संरक्षण और मान मंदिर से जुड़े काम उनके बाद भी चलते रहें।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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