Maghi Ganesh Jayanti Vrat katha in Hindi, (विनायक चतुर्थी व्रत कथा) : इन कथाओं के बिना अधूरा है विनायक चतुर्थी का व्रत, पढ़ें शिव-पार्वती और बुढ़िया माई की कथा
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 22, 2026, 12:58 PM IST
Vinayak Chaturthi Vrat katha in Hindi (विनायक चतुर्थी व्रत कथा), First Vinayak Chaturthi 2026 Puja Vidhi: साल 2026 में पहली विनायक चतुर्थी (माघी गणेश जयंती) का व्रत 22 जनवरी को रखा जा रहा है। माना जाता है कि इस दिन विनायक चतुर्थी की कथा पढ़े या सुने बिना व्रत अधूरा होता है। विनायक चतुर्थी के व्रत को लेकर दो कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं कि विनायक चतुर्थी के व्रत की कथा क्या है?
विनायक चतुर्थी व्रत कथा
Vinayak Chaturthi Vrat katha in Hindi (विनायक चतुर्थी व्रत कथा), First Vinayak Chaturthi 2026 Puja Vidhi (पूजा विधि): सनातन धर्म में विनायक चतुर्थी का व्रत बहुत ही पवित्र माना गया है। इसको माघी गणेश जयंती भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो कोई भी इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति भाव से करता है, उसके जीवन की सभी बाधाएं और संकट दूर हो जाते हैं। हर माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है, जिसे विनायक चतुर्थी कहते हैं। इस बार यह व्रत 22 जनवरी 2026, गुरुवार को पड़ रहा है। यह साल 2026 की पहली विनायक चतुर्थी है।
इस दिन भगवान गणेश को विशेष रूप से दूर्वा (दूब घास) अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। व्रत के दौरान उपवास रखकर पूजा और भोग अर्पित करना पुण्यकारी होता है। इसके साथ ही, शिव-पार्वती से जुड़ी गणेश कथा और बुढ़िया माई की कथा का पाठ करने से भगवान गणेश शीघ्र प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। बिना कथा के यह व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं कि विनायक चतुर्थी की कथा क्या है?
शिव-पार्वती और बालक की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के पावन तट पर निवास कर रहे थे। एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने माता की इच्छा स्वीकार कर ली, लेकिन समस्या यह थी कि खेल में जीत-हार का निर्णय कौन करेगा।
इसलिए भगवान शिव ने पास पड़े तिनकों से एक बालक का निर्माण किया और उसमें अपने योगबल से प्राण प्रतिष्ठा कर दी। उस बालक से शिव जी ने कहा कि वह चौपड़ के खेल में निष्पक्ष होकर निर्णय देगा।
इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती के बीच चौपड़ का खेल शुरू हुआ। यह खेल तीन बार खेला गया और तीनों बार माता पार्वती विजयी रहीं। जब खेल समाप्त हुआ और बालक से निर्णय पूछा गया, तो उसने माता पार्वती के स्थान पर भगवान शिव को विजेता बता दिया।
यह सुनते ही माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने उस बालक को श्राप दे दिया कि वह लंगड़ा हो जाएगा और कीचड़ में पड़ा रहेगा। श्राप मिलते ही बालक दुखी हो गया और माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। उसने कहा कि उससे यह गलती अज्ञानवश हो गई है।
बालक की करुण पुकार सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने कहा कि एक वर्ष बाद उसी स्थान पर नागकन्याएं आएंगी, जो उसे गणेश व्रत की विधि बताएंगी। उस व्रत को करने से उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। एक वर्ष बाद नागकन्याएं वहां आईं और उन्होंने बालक को विनायक चतुर्थी व्रत की पूरी विधि बताई। बालक ने लगातार 21 दिनों तक श्रद्धा और नियम के साथ भगवान गणेश का व्रत किया। उसकी भक्ति से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और स्वयं प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बालक ने विनम्रता से कहा कि वह अपने पैरों से चलकर कैलाश पर्वत तक पहुंचना चाहता है। भगवान गणेश ने उसे यह वरदान दे दिया। इसके बाद बालक कैलाश पहुंचा और सारी कथा भगवान शिव को सुनाई।
उधर, माता पार्वती अभी भी चौपड़ वाली घटना से नाराज थीं। माता को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने भी उसी विधि से 21 दिनों तक विनायक चतुर्थी व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती की नाराजगी समाप्त हो गई। कहा जाता है कि जब माता पार्वती ने इस व्रत का महत्व जाना, तो उन्होंने भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिनों तक गणेश व्रत किया। व्रत के 21वें दिन भगवान कार्तिकेय स्वयं माता पार्वती से मिलने आए। तभी से इस व्रत को सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है।
बुढ़िया माई और मिट्टी के गणेश की कथा
एक गांव में एक बुढ़िया माई रहती थी। वह अत्यंत गरीब थी, लेकिन भगवान गणेश के प्रति उसकी श्रद्धा अटूट थी। हर सुबह वह मिट्टी से भगवान गणेश की छोटी-सी मूर्ति बनाती और पूरे मन से उनकी पूजा करती थी। लेकिन मिट्टी की मूर्ति रोज गल जाती थी और उसे हर दिन नई मूर्ति बनानी पड़ती थी। बुढ़िया माई की इच्छा थी कि उसके पास पत्थर के गणेश हों, ताकि वह रोज-रोज नई मूर्ति न बनाए और उसकी पूजा निरंतर चलती रहे।
उसके घर के पास एक सेठ जी का बड़ा मकान बन रहा था, जहां कई मिस्त्री काम कर रहे थे। एक दिन बुढ़िया माई वहां पहुंची और हाथ जोड़कर मिस्त्रियों से बोली कि वे उसके लिए पत्थर के गणेश बना दें। मिस्त्रियों ने उसकी बात को मजाक में उड़ा दिया और मना कर दिया। यह सुनकर बुढ़िया माई को बहुत दुख हुआ। उसकी भक्ति का अपमान हुआ था। उसने पीड़ा में कहा कि उनकी दीवार टेढ़ी हो जाए।
उसके इतना कहते ही मिस्त्री चाहे जितनी बार दीवार बनाते, वह हर बार टेढ़ी हो जाती। पूरा दिन बीत गया, लेकिन दीवार ठीक नहीं बनी। शाम को जब सेठ जी आए, तो उन्होंने सारा मामला समझा। सेठ जी को अहसास हो गया कि यह सब भगवान गणेश की लीला है। उन्होंने तुरंत बुढ़िया माई को बुलवाया और सम्मानपूर्वक कहा कि वे उसके लिए सोने के गणेश बनवाएंगे। जैसे ही सोने के गणेश बनाए गए, सेठ जी की दीवार अपने आप सीधी हो गई। तब से यह मान्यता प्रचलित हुई कि सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती है। 'हे गणेश भगवान, जैसे आपने सेठ की दीवार सीधी की, वैसे ही हमारे जीवन की टेढ़ी राहों को भी सीधा कर दीजिए।'
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।