अध्यात्म

Vikat Sankashti Chaturthi Vrat Katha: आज चंद्रोदय से पहले जरूर करें इस कथा का पाठ, देखें विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

  • Authored by: Srishti
  • Updated Apr 5, 2026, 08:27 AM IST

Vikat Sankashti Chaturthi Vrat Katha (विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): हिंदू पंचांग अनुसार वैसाख महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विकट संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं अनुसार इस दिन व्रत रखने से भगवान गणेश जीवन की सभी परेशानियों का अंत कर देते हैं। व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस पौराणिक कथा का पाठ जरूर करें। इस कथा का पाठ चांद निकलने से पहले कर लेना है।

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विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (pc: canva)

Vikat Sankashti Chaturthi Vrat Katha (विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): विकट संकष्टी चतुर्थी की कथा अनुसार एक राज्य में धर्मकेतु नाम का एक ज्ञानी ब्राह्मण रहता था। उसकी दो पत्नी थीं एक का नाम सुशीला तो दूसरी का नाम चंचला था। सुशीला धार्मिक स्वभाव की थी जबकि चंचला का धर्म-कर्म के कार्यों में बिल्कुल भी मन नहीं लगता थाा। व्रत करने के कारण सुशीला बहुत कमजोर हो गई थी, जबकि चंचला की सेहत काफी अच्छी थी। कुछ समय बाद सुशीला को एक पुत्री हुई तो चंचला को पुत्र की प्राप्ति हुई। ये देख चंचला ने सुशीला से कहा कि तुम इतने व्रत-उपवास करती हो तब भी तुम्हें पुत्री ही प्राप्त हुई जबकि मैंने तो कुछ भी नहीं किया लेकिन फिर भी मुझे पुत्र प्राप्त हुआ। सुशीला को ये सुनकर बहुत बुरा लगा।

जब विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत आया तो सुशीला ने ये व्रत सच्चे मन से किया। सुशीला की भक्ति से गणेशजी प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। सुशीला को शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन दुर्भाग्यवश उसके पति धर्मकेतु की मृत्यु हो गई। इसके बाद चंचला अलग घर में रहने लगी। लेकिन सुशीला पति के घर में रहकर ही अपने बच्चों का पालन करने लगी। सुशीला का पुत्र बेहद ज्ञानी था, कुछ ही समय में उसने अपना घर धन-धान्य से भर दिया।

ये देख चंचला को जलन होने लगी और मौका मिलते ही उसने सुशीला की पुत्री को कुएं में धकेल दिया। लेकिन भगवान गणेश ने उसकी रक्षा की। चंचला ने जब ये देखा कि भगवान गणेश सुशीला के परिवार की रक्षा कर रहे हैं तो उसे अपने कर्मों पर पछतावा होने लगा। इसके बाद उसने तुरंत ही सुशीला से माफी मांगी। फिर सुशीला के कहने पर चंचला ने भी विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। जिससे उसके परिवार पर भी गणेश जी की कृपा बरसने लगी।

वैशाख विकट संकष्टी चतुर्थी की कथा-

विकट संकष्टी चतुर्थी की एक और पौराणिक कथा अनुसार, एक समय कामासुर नाम के दैत्य ने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे अजय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान पाकर कामासुर अहंकारी हो गया और उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को अपना बंदी बना लिया। दुखी होकर सभी देवता भगवान शिव के पास गए, लेकिन शिव जी ने बताया कि कामासुर को उनके ही वरदान की शक्ति प्राप्त है, इसलिए उसे केवल विघ्नहर्ता गणेश ही हरा सकते हैं।

तब देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान गणेश ने विकट रूप धारण किया और मोर पर सवार होकर कामासुर से युद्ध करने पहुंचे। भगवान गणेश के इस विशाल और तेजस्वी रूप को देखकर कामासुर डर गया। वहीं, गणेश जी ने अपनी बुद्धि और शक्ति से कामासुर के घमंड को नष्ट कर दिया। अंत में कामासुर ने भगवान गणेश के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी।

गणेश जी ने उसे जीवनदान दिया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया, जिस दिन गणेश जी ने कामासुर पर विजय प्राप्त की थी वह वैशाख चतुर्थी का दिन था, जिसे विकट संकष्टी चतुर्थी कहा गया। इस दिन व्रत और बप्पा की पूजा-अर्चना करने से सभी दुखों का अंत होता है। साथ ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

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सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्... और देखें

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