विनाश का कारण बनते हैं ये 6 काम, महात्मा विदुर ने अपनी नीति में बताए हैं ये दोष
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Feb 4, 2026, 08:37 PM IST
Vidur Niti: महाभारत काल के महात्मा विदुर ने अपनी नीतियों कुछ ऐसे कर्म बताए हैं, जिनको करने वाला व्यक्ति अल्पआयु हो जाता है। माना जाता है कि इन कार्यों करने से व्यक्ति की आयु धीरे-धीरे कम होने लगती है। ये दोष व्यक्ति के विनाश का कारण बनते हैं। आइए जानते हैं कि वे कौन से ऐसे काम हैं, जिन्हें नहीं करना चाहिए?
विदुर नीति
Vidur Niti: द्वापरयुग में महाभारत का युद्ध हुआ था। उस समय एक ऐसे विद्वान थे, जिनकी नीतियां आज के समय भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी तब हुआ करती थीं। महात्मी विदुर की ये नीतियां जीवन जीने की कला भी सिखाती हैं। विदुर नीति में मनुष्य के आचरण, व्यवहार और जीवन से जुड़े कई गहरे सत्य बताए गए हैं। महात्मा विदुर ने अपनी नीतियों में दीर्घायु और अल्प आयु होने के कारणों पर भी प्रकाश डाला है।
महाभारत के अनुसार, हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र के मन में यह प्रश्न उठा कि जब वेदों और शास्त्रों में मनुष्य की आयु 100 वर्ष बताई गई है, तो फिर अधिकतर लोग अपनी पूरी आयु क्यों नहीं जी पाते है? इसी प्रश्न का उत्तर महात्मा विदुर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में दिया है। उन्होंने कुछ ऐसे उपाय बताए हैं, जो व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं।
धृतराष्ट्र का प्रश्न
धृतराष्ट्र महात्मा विदुर से पूछते हैं कि जब शास्त्रों में मनुष्य को दीर्घायु बताया गया है, तो फिर मनुष्य अल्पायु क्यों हो जाता है?
महात्मा विदुर का उत्तर
महात्मा विदुर कहते हैं कि मनुष्य की आयु किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि अपने ही दोषों और कर्मों के कारण कम होती है। उन्होंने ऐसे छह दोषों का उल्लेख किया है, जो मनुष्य की आयु को धीरे-धीरे काट देते हैं। ये व्यक्ति का ऐसा पतन करते हैं, जिनसे उबरना मुश्किल हो जाता है।
अत्यंत अभिमान यानी घमंड
विदुर नीति के अनुसार अभिमान मनुष्य का पहला और सबसे खतरनाक दोष है। जब कोई व्यक्ति अपने पद, धन, ज्ञान या शक्ति के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तो वह अभिमान का शिकार हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझता है, उनका अपमान करता है और उसके शत्रु बढ़ने लगते हैं। अंततः यही अभिमान उसके पतन और आयु क्षय का कारण बनता है।
अधिक बोलना
जो व्यक्ति आवश्यकता से अधिक बोलता है और व्यर्थ की बातें करता है, वह कई बार ऐसी बातें कह देता है, जिनसे विवाद और शत्रुता जन्म लेती है। विदुर नीति के अनुसार असंयमित वाणी व्यक्ति के सम्मान, मानसिक शांति और सामाजिक संबंधों को नष्ट कर देती है। अधिक बोलने वाला व्यक्ति न बुद्धिमानों को प्रिय होता है और न ही उसकी बातों का प्रभाव रहता है, जिससे उसका जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे लोगों की आयु कम होती है।
क्रोध यानी गुस्सा
क्रोध को विदुर नीति में मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है। क्रोध में व्यक्ति विवेक खो देता है और ऐसे कर्म कर बैठता है, जिनका परिणाम जीवनभर भुगतना पड़ता है। शास्त्रों में क्रोध को नरक का द्वार कहा गया है। अत्यधिक क्रोध से मानसिक तनाव, रोग और अशांति पैदा होती है, जिससे आयु कम होती है।
त्याग का अभाव
त्याग का अभाव भी मनुष्य की आयु घटाने वाला बड़ा दोष माना गया है। जो व्यक्ति केवल भोग, धन और सांसारिक सुखों में डूबा रहता है, उसका जीवन धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। विदुर नीति के अनुसार रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों का पतन त्याग की भावना न होने के कारण ही हुआ। त्याग जीवन को बढ़ाता है, जबकि आसक्ति जीवन को काटती है।
स्वार्थ यानी लालच
स्वार्थ और लालच को अधर्म की जड़ कहा गया है। धन, भूमि, सत्ता या लाभ के लिए किया गया स्वार्थ व्यक्ति को पाप की ओर ले जाता है। स्वार्थी व्यक्ति दूसरों का अहित करने से भी नहीं हिचकता, जिससे उसके रिश्ते टूट जाते हैं और जीवन में अशांति बढ़ जाती है। विदुर नीति के अनुसार स्वार्थी व्यक्ति की आयु कम हो जाती है।
मित्रद्रोह
मित्रद्रोह यानी अपने मित्र के साथ विश्वासघात करना सबसे बड़ा दोष माना गया है। शास्त्रों में मित्रों को जीवन की शक्ति कहा गया है। जो व्यक्ति अपने मित्रों को धोखा देता है, उसका जीवन भय, तनाव और अकेलेपन से भर जाता है। विदुर नीति के अनुसार मित्रद्रोही व्यक्ति का जीवन नरक के समान हो जाता है।
क्या कहती है विदुर नीति?
महात्मा विदुर द्वारा बताए गए ये छह दोष अभिमान, अधिक बोलना, क्रोध, त्याग का अभाव, स्वार्थ और मित्रद्रोह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक दोष दूसरे दोष को जन्म देता है। विदुर नीति के अनुसार, यदि मनुष्य इन दोषों से दूर रहे, संयम, त्याग, शांति और सद्भाव को अपनाए, तो वह न केवल दीर्घायु होता है, बल्कि सुखी और संतुलित जीवन भी जीता है।