अध्यात्म

कैसे करें सच्चे गुरु की पहचान, क्या है सत्य और क्या है अंधविश्वास, पाएं सनातन धर्म से जुड़े अनसुलझे सवालों के जवाब स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज से

सनातन धर्म में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। माना जाता है कि गुरु व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक जीवन का फर्क बताता है। इसके साथ ही गुरु कृपा से ही ईश्वर को पाया जा सकता है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर गुरु या सद्गुरु की पहचान कैसे करें। गुरु किसको बनाना चाहिए। इन सभी विषयों का उत्तर आज हम स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज से जानेंगे। इसके साथ ही ये भी जानेंगे कि क्या सत्य है और क्या असत्य है, क्या अंधविश्वास है और क्या सचमुच पूजन का विधान है।

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जानिए श्रद्धा और अंधविश्वास में अंतर

सनातन धर्म में गुरु की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि सच्चे गुरु या सद्गुरु की पहचान कैसे की जाए और उन्हें पाया कैसे जाए। इसके अलावा मंदिरों की परंपराओं, पूजा-पाठ के नियमों और आध्यात्मिक साधना को लेकर भी लोगों के मन में कई तरह के सवाल रहते हैं। इन सभी विषयों के उत्तर जूना अखाड़ा के प्रसिद्ध संत महमंडलेश्वर स्वामी डॉ. उमाकांतानंद सरस्वती जी महाराज से जानते हैं।

सद्गुरु मिलते कैसे हैं और उनकी पहचान क्या है?

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि सद्गुरु मिलने से पहले शिष्य की पात्रता जरूरी होती है। अक्सर लोग कहते हैं कि आज के समय में सच्चे गुरु नहीं मिलते, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या आज सच्चे शिष्य मिलते हैं? अगर कोई व्यक्ति सच्चे मन से गुरु की तलाश करता है और उसके भीतर ईश्वर को पाने की वास्तविक इच्छा होती है, तो उसे गुरु अवश्य मिलते हैं।

कई लोग गुरु के पास इसलिए जाते हैं कि उनका कोई काम बन जाए, उन्हें लाभ मिल जाए या उनकी समस्याएं तुरंत खत्म हो जाएं। ऐसे लोगों को उसी प्रकार के लोग मिल जाते हैं, लेकिन सच्चे गुरु वही पाते हैं जिनके भीतर श्रद्धा, सरलता और समर्पण की भावना होती है।

गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है?

स्वामी जी ने बताया कि गुरु शब्द अपने आप में ही पूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति वास्तव में गुरु है तो वह अपने आप सद्गुरु ही होता है। शास्त्रों में ‘गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर’ कहा गया है और वहां सद्गुरु शब्द अलग से नहीं जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि अगर कोई व्यक्ति गुरु है तो उसमें सत्य और ज्ञान दोनों मौजूद होंगे। अगर किसी में सत्य नहीं है तो वह गुरु कहलाने के योग्य नहीं है। इस कारण गुरु और सद्गुरु में अलग से कोई बड़ा अंतर नहीं माना गया है, बल्कि असली बात यह है कि व्यक्ति के भीतर गुरु होने की योग्यता होनी चाहिए।

मंदिरों में देवी का श्रृंगार पुजारी ही क्यों करते हैं?

उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि इसके पीछे कोई विशेष धार्मिक कारण नहीं है। यह अधिकतर सामाजिक व्यवस्था के कारण हुआ है। पुराने समय में महिलाएं घर और परिवार की जिम्मेदारी संभालती थीं। बच्चों की देखभाल करना, परिवार को संस्कार देना और घर की व्यवस्था बनाए रखना महिलाओं की जिम्मेदारी मानी जाती थी।

वहीं, पुरुष बाहर के काम जैसे खेती, व्यापार और अन्य सामाजिक कार्य करते थे। इसी वजह से मंदिरों में पुजारी बनने की परंपरा अधिकतर पुरुषों में रही है। हालांकि अब समय बदल चुका है और महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। इस कारण अगर महिलाएं पूजा-पाठ या पुजारी का कार्य करना चाहें तो इसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

मंदिर में बाल बांधकर और सिर ढककर क्यों जाना चाहिए?

स्वामी जी ने बताया कि हमारे शरीर में छह चक्र बताए गए हैं और सातवां चक्र सहस्रार चक्र माना जाता है, जो सिर के ऊपरी भाग में स्थित होता है। इसी स्थान पर चोटी रखने की परंपरा भी बताई गई है। प्राचीन समय में पुरुष और महिलाएं दोनों लंबे बाल रखते थे और चोटी बांधकर रखते थे।

ऐसा माना जाता था कि बालों का संबंध ऊर्जा और चेतना से होता है, इसलिए पूजा-पाठ के समय बालों को बांधकर रखना उचित माना गया है। वहीं सिर पर कपड़ा या पल्ला रखना सम्मान और समर्पण की भावना का प्रतीक माना जाता है। जब व्यक्ति मंदिर में जाता है तो वह भगवान के सामने विनम्रता और श्रद्धा के साथ उपस्थित होता है, इसलिए सिर ढकने की परंपरा बनाई गई है।

क्या सोशल मीडिया या इंटरनेट से मंत्र लेकर जप करना सही है?

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि आजकल बहुत लोग इंटरनेट या सोशल मीडिया से मंत्र लेकर जप करना शुरू कर देते हैं और कई जगहों पर पैसे लेकर कुंडलिनी जागरण कराने के दावे भी किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह सही तरीका नहीं है। मंत्र बहुत शक्तिशाली होता है और उसे सिद्ध करने के लिए लंबे समय तक साधना करनी पड़ती है। परंपरा के अनुसार गुरु अपने मुख से मंत्र देता है और उसे सिद्ध करके शिष्य को प्रदान करता है। इसलिए केवल किताब पढ़कर या इंटरनेट से मंत्र लेकर जप करना आध्यात्मिक साधना का सही मार्ग नहीं माना जाता है।

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज

गंगा स्नान से पहले स्नान करना जरूरी है या नहीं?

स्वामी जी ने बताया कि इसमें कोई विशेष बाध्यता नहीं है। गंगा को अपने आप में पवित्र माना गया है और उसे केवल एक नदी नहीं बल्कि मां के रूप में देखा जाता है। इस कारण अगर कोई व्यक्ति सीधे गंगा में स्नान करता है तो उसमें कोई गलत बात नहीं है। गंगा का जल अपने आप में पवित्र माना गया है और उसमें स्नान करने से ही शुद्धि मानी जाती है।

नदी में सिक्के डालने की परंपरा कितनी सही है?

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि नदी में सिक्के डालना उचित नहीं माना जाता है। अगर किसी व्यक्ति के मन में श्रद्धा है तो वह नदी को प्रणाम कर सकता है और आभार व्यक्त कर सकता है, लेकिन सिक्के पानी में फेंकने से बेहतर है कि वही पैसा किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दे दिया जाए। इससे किसी की मदद भी हो जाएगी और दान का सही उपयोग भी हो सकेगा।

पूजा करते समय दिया बुझने का क्या अर्थ होता है?

स्वामी जी ने बताया कि कई बार लोग पूजा के दौरान दिया बुझ जाने को अपशकुन मान लेते हैं, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार हवा चलने या किसी छोटी सी लापरवाही के कारण भी दिया बुझ सकता है। इस कारण हर छोटी घटना को अंधविश्वास से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। सावधानी रखना जरूरी है और हर बात को शकुन-अपशकुन से जोड़ना उचित नहीं माना जाता है।

दान करने के बाद उसका प्रचार करना है गलत

स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति दान करने के बाद यह बताता है कि उसने कितना दान दिया है, तो उसका महत्व कम हो जाता है। असली दान वही माना जाता है जो बिना किसी दिखावे और प्रचार के किया जाए। अगर कोई व्यक्ति दान केवल प्रसिद्धि पाने के लिए करता है तो वह दान का सही भाव नहीं माना जाता। दान में सबसे महत्वपूर्ण चीज राशि नहीं बल्कि व्यक्ति की भावना और नीयत होती है।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी स्वामी उमाकांत नंद सरस्वती जी महाराज द्वारा दिए गए जवाबों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Dr Rama Solanki
डॉ रमा सोलंकीauthor

डॉ. रमा सोलंकी टीवी और डिजिटल मीडिया में 17 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट हैं, जिन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है। वह प्रभावशाली स्टोरीटेलिंग और डिजिटल इनोवेशन के संयोजन के लिए जानी जाती हैं। वह एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, डॉक्यूमेंट्री और ऑडियंस-सेंट्रिक कंटेंट के निर्माण में विशेष दक्षता रखती हैं। डॉ. सोलंकी शासन, जवाबदेही और जनहित से जुड़े राजनीतिक व खोजी कार्यक्रमों के निर्माण और एंकरिंग के लिए भी पहचान रखती हैं। आध्यात्मिक कंटेंट प्रोडक्शन में विशेषज्ञता रखते हुए उन्होंने लोकप्रिय टीवी और डिजिटल सीरीज का निर्माण व निर्देशन किया है, जिन्हें दर्शकों से व्यापक सराहना मिली। डिजिटल मीडिया में पीएचडी धारक डॉ. रमा सोलंकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कथाओं को आधुनिक प्रस्तुति और समकालीन संदर्भों से जोड़ने के लिए जानी जाती हैं।

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