अध्यात्म

12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला है सोमनाथ मंदिर, जानिए कैसे और क्यों प्रकट हुआ सोमनाथ का शिवलिंग

Somnath Temple history In Hindi: हिंदू धर्म में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों को सबसे प्रमुख माना गया है। इनमें से सबसे पहला स्थान सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का है। गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित इस ज्योतिर्लिंग की सबसे पहले पूजा सोम यानी चंद्रमा ने की थी। इस कारण इस मंदिर का नाम सोमनाथ (मतलब चंद्रमा के नाथ भगवान शिव) पड़ा। आइए जानते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग से जुड़े कुछ खास तथ्य क्या हैं?

सोमनाथ मंदिर कथा

सोमनाथ मंदिर कथा

Somnath Temple history In Hindi: हिंदू धर्म में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग सबसे पवित्र स्थानों में गिने जाते हैं। इनमें सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को पहला स्थान प्राप्त है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल (प्रभास पाटन) के पास अरब सागर के किनारे स्थित यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि शिव की अनंत ऊर्जा और भारत की सभ्यता की अमरता का प्रतीक भी है। शिवपुराण की ज्ञानसंहिता (अध्याय 13) और स्कंदपुराण जैसे ग्रंथों में सोमनाथ को ज्योतिर्लिंगों की सूची में सबसे ऊपर रखा गया है।

कैसे प्रकट हुआ सोमनाथ का शिवलिंग?

शिवपुराण और अन्य पुराणों के अनुसार, प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियां (जिनको हम नक्षत्रों के नाम से जानते हैं) का विवाह चंद्रदेव (सोम) से हुआ था। विवाह के बाद चंद्रमा अपनी सबसे प्रिय पत्नी रोहिणी के साथ ज्यादा समय बिताते थे, इससे उनकी बाकी पत्नियां नाराज हो गईं। उन्होंने पिता दक्ष से इस बात की शिकायत की। क्रोधित दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया कि उनको क्षय रोग हो जाएगा। उनकी चमक दिन-ब-दिन कम होती जाएगी और वे क्षीण हो जाएंगे। इसी कारण आज भी चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती हैं और पूर्णिमा के दिन वे 16 कलाओं से युक्त होते हैं।

श्राप से प्रभावित होकर चंद्रमा की रोशनी फीकी पड़ गई, जिससे दुनिया अंधेरे में डूबने लगी। ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को सलाह दी कि वे प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ का स्थान) जाकर सरस्वती नदी के तट पर भगवान शिव की घोर तपस्या करें। चंद्रदेव ने मिट्टी से शिवलिंग बनाकर वहां महामृत्युंजय मंत्र का लाखों बार जप किया और भगवान शिव की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां ज्योति के रूप में प्रकट हुए और चंद्रमा को श्राप से मुक्त किया।

उन्होंने वरदान दिया कि चंद्रमा अमर रहेंगे, लेकिन हर पखवाड़े में उनकी चमक बढ़ती-घटती रहेगी।

चंद्रदेव ने भगवान शिव से यहीं विराजमान रहने की प्रार्थना की, जिसे स्वीकार कर भगवान शिव सोमनाथ (सोम के नाथ या चंद्रमा के स्वामी) के रूप में इस स्थान पर ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हो गए। इस कारण इसे स्वयंभू मतलब स्वयं प्रकट ज्योतिर्लिंग माना जाता है और इसे अन्य 12 ज्योतिर्लिंगोंमें पहला दर्जा मिला। इसके बाद चंद्रदेव ने सोने से मंदिर बनवाया। उसके बाद में रावण ने चांदी से व भगवान कृष्ण ने चंदन से और भीमदेव ने पत्थर से पुनर्निर्माण कराया।

कई ग्रंथों में मिलता है मंदिर का जिक्र

ऋग्वेद में प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ) का जिक्र मिलता है, जहां चंद्रदेव की तपस्या और तीर्थ का महत्व बताया गया है। महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण और स्कंदपुराण में भी इसकी महिमा वर्णित है। यहां भगवान कृष्ण ने अंतिम समय बिताया और उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार त्रिवेणी संगम (हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का संगम) पर हुआ। यह स्थान त्रिवेणी संगम के कारण तीर्थ भी है, जहां स्नान से पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष मिलता है।

क्या है बाण स्तंभ (Arrow Pillar) का रहस्य?

मंदिर परिसर में समुद्र की ओर एक बाण स्तंभ (Arrow Pillar) है, जिस पर संस्कृत शिलालेख है कि ‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग’ । इसका अर्थ है कि इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव (अंटार्कटिका) तक समुद्र में कोई भूमि या बाधा नहीं है। यह प्राचीन भारतीयों की भूगोल और खगोल विज्ञान की गहरी समझ दिखाता है। सोमनाथ से दक्षिण की सीधी रेखा में कोई महाद्वीप नहीं मिलता है। यह स्तंभ छठी शताब्दी से मौजूद माना जाता है।

कई बार तोड़ा गया मंदिर और फिर हुआ पुनर्निर्माण

सोमनाथ मंदिर को 17 बार नष्ट किया गया, लेकिन हर बार यह उठ खड़ा हुआ। 1026 ई. में महमूद गजनवी ने हमला कर मंदिर का सोना व अन्य चीजों को लूटा और ज्योतिर्लिंग को तोड़ा। इस दौरान माना जाता है कि करी 20 मिलियन दीनार की लूट हुई थी। इसके बाद में अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब आदि ने भी इसे नष्ट किया।

राजा भीमदेव, कुमारपाल, अहिल्याबाई होलकर आदि ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। जनता के दान से मंदिर बनवाया गया। वहीं, महात्मा गांधी की सलाह पर राज्य फंड नहीं इस्तेमाल किया गया। वर्तमान मंदिर 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्र को समर्पित किया। यह मारु-गुर्जर शैली में बना है, जिसमें 155 फीट ऊंचा शिखर है। इसके चलते सोमनाथ मंदिर अमर हो गया। सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, धैर्य और पुनरुत्थान की जीवंत गाथा है। यहां दर्शन से मन की शांति, पाप मुक्ति और सुख-समृद्धि मिलती है।

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Mohit Tiwari
Mohit Tiwari author

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ... और देखें

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