अध्यात्म

देवशयनी एकादशी को और क्या कहा जाता है, क्यों हरिशयनी, पद्मा और आषाढ़ी जैसे अलग-अलग नामों से जानी जाती है ये ग्यारस

Devshayani Ekadashi Different Names: देवशयनी एकादशी को हरिशयनी, पद्मा, आषाढ़ी, देवपोढ़ी और थोली एकादशी क्यों कहते हैं? जानें हर नाम का अर्थ, पुराणों में उल्लेख और क्षेत्रीय परंपराएं।

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देवशयनी एकादशी के इतने अलग नाम क्यों हैं

Devshayani Ekadashi Different Names: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आते ही अलग-अलग नाम सुनाई देने लगते हैं। कोई इसे देवशयनी एकादशी कहता है, किसी पंचांग में हरिशयनी लिखा मिलता है तो कहीं पद्मा या आषाढ़ी एकादशी। गुजरात पहुंचते-पहुंचते यही तिथि देवपोढ़ी ग्यारस बन जाती है और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कई क्षेत्रों में इसे थोली एकादशी कहा जाता है।

अब सवाल उठता है कि जब तिथि एक है और आराध्य भगवान विष्णु ही हैं, तो इस एकादशी के इतने नाम क्यों हैं?

इसका सीधा उत्तर यह है कि हर नाम इस पर्व के किसी अलग भाव को सामने रखता है। किसी नाम में भगवान विष्णु का योगनिद्रा में जाना प्रमुख है, किसी में उनका हरि या पद्मनाभ स्वरूप, तो किसी में आषाढ़ मास और स्थानीय भक्ति परंपरा। नाम बदलते गए, लेकिन पर्व का मूल भाव वही रहा- श्रीहरि की उपासना, संयम और चातुर्मास का आरंभ।

सबसे पहले समझें, यह कौन-सी एकादशी है

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सामान्य रूप से देवशयनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं।

भगवान का यह शयन आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक माना गया है। कार्तिक मास में जिस एकादशी पर भगवान के जागने की परंपरा है, उसे देवउठनी, देवोत्थान, प्रबोधिनी या हरिबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इन दोनों एकादशियों के बीच का समय चातुर्मास कहलाता है।

देवशयनी एकादशी के अलग अलग नाम क्यों हैं

देवशयनी एकादशी के अलग अलग नाम क्यों हैं

यहां भगवान के सोने का अर्थ मनुष्यों की तरह थककर विश्राम करना नहीं है। शास्त्रीय परंपरा में इसे ‘योगनिद्रा’ कहा गया है। इसका भाव संसार से अनुपस्थित होना नहीं, बल्कि सृष्टि का संचालन करते हुए अंतर्मुखी अवस्था में जाना है।

एक नजर में इस एकादशी के प्रमुख नाम

  • देवशयनी एकादशी: भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के कारण
  • हरिशयनी एकादशी: श्रीहरि के शयन का संकेत
  • आषाढ़ी एकादशी: आषाढ़ मास में आने के कारण
  • पद्मा या पद्मनाभा एकादशी: भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप से जुड़ा नाम
  • महा एकादशी: महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में विशेष महत्व के कारण
  • देवपोढ़ी ग्यारस: गुजरात में प्रचलित स्थानीय नाम
  • थोली या टोली एकादशी: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रचलित नाम

देवशयनी में छिपा है भगवान के शयन का भाव

‘देवशयनी’ शब्द देव और शयन से मिलकर बना है। इसका सरल अर्थ है- कादशी, जिस दिन भगवान शयन करते हैं। यहां ‘देव’ से आशय मुख्य रूप से जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु से है।

यह एकादशी वर्षा ऋतु के आसपास आती है। पुराने समय में वर्षा के कारण नदियां उफान पर होती थीं, कच्चे रास्तों पर चलना कठिन हो जाता था और लंबी यात्राओं में जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचने की आशंका भी बढ़ जाती थी। ऐसे में साधु-संत भ्रमण रोककर एक स्थान पर रहकर जप, अध्ययन और साधना करते थे।

इसी से चातुर्मास में ठहरने और स्वयं को अनुशासित करने की परंपरा मजबूत हुई। मानो भगवान अपने भक्तों से कह रहे हों- कुछ समय बाहरी यात्राओं को विराम देकर अपने भीतर उतरकर भी देखिए।

ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज कहते हैं कि भगवान विष्णु की योगनिद्रा निष्क्रियता का नहीं, भीतर लौटने का प्रतीक है। देवशयनी एकादशी से भक्त को यह संकल्प लेना चाहिए कि अगले चार महीने वह अपने खान-पान, वाणी और व्यवहार में कम से कम एक सकारात्मक परिवर्तन अवश्य लाए।

हरिशयनी क्यों कहते हैं, क्या यह अलग एकादशी है

भगवान विष्णु का एक प्रिय नाम हरि है। धार्मिक अर्थ में हरि वह हैं, जो भक्त के पाप, दुख और कष्ट हर लेते हैं। श्रीहरि के योगनिद्रा में जाने के कारण इस तिथि को हरिशयनी एकादशी कहा गया।

इसलिए हरिशयनी और देवशयनी दो अलग-अलग एकादशियां नहीं हैं। देवशयनी नाम भगवान के देव स्वरूप को प्रमुखता देता है, जबकि हरिशयनी स्पष्ट करता है कि शयन करने वाले देव स्वयं श्रीहरि विष्णु हैं।

पंडित मयंक शर्मा समझाते हैं कि उत्तर भारत की व्रत-कथा परंपराओं और धार्मिक पंचांगों में हरिशयनी नाम काफी प्रचलित है। इसके ठीक विपरीत भाव वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी को हरिबोधिनी कहा जाता है। आषाढ़ में हरि का शयन और कार्तिक में उनका जागरण- इनके बीच का समय भक्त के लिए आत्मचिंतन, त्याग और साधना का माना गया है।

आषाढ़ी एकादशी कहते ही याद आती है पंढरपुर की वारी

आषाढ़ मास में आने के कारण इसका सबसे सीधा नाम ‘आषाढ़ी एकादशी’ पड़ा। हालांकि महाराष्ट्र में यह केवल कैलेंडर में दर्ज व्रत की तारीख नहीं, बल्कि भक्ति का एक विराट उत्सव है।

महाराष्ट्र में भगवान विष्णु की विट्ठल या विठोबा स्वरूप में पूजा होती है। पंढरपुर के विट्ठल मंदिर में भगवान को कमर पर हाथ रखकर खड़े हुए दिखाया गया है। इस स्वरूप को लेकर भक्तों का भाव है कि विट्ठल अपने भक्तों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

आषाढ़ी एकादशी से पहले बड़ी संख्या में वारकरी पैदल पंढरपुर की ओर निकलते हैं। संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी आलंदी से और संत तुकाराम महाराज की पालखी देहू से चलती है। श्रद्धालु हाथों में पताका लेकर, अभंग गाते हुए कई दिनों की यात्रा पूरी करते हैं। इस भक्ति यात्रा को ‘वारी’ कहा जाता है।

इसलिए महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी के साथ पंढरपुर, चंद्रभागा नदी, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और विट्ठल भक्ति की पूरी विरासत जुड़ जाती है। इसके विशेष महत्व के कारण इसे ‘महा एकादशी’ भी कहा जाता है।

पद्मा या पद्मनाभा एकादशी नाम का क्या अर्थ है

आषाढ़ शुक्ल एकादशी का एक नाम पद्मा या पद्मनाभा एकादशी भी बताया जाता है। संस्कृत में ‘पद्म’ का अर्थ कमल है और कमल का भगवान विष्णु से गहरा संबंध माना गया है।

पौराणिक वर्णन के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिस पर ब्रह्माजी विराजमान हुए। इसीलिए भगवान विष्णु का एक नाम ‘पद्मनाभ’ है। इस एकादशी पर उनके पद्मनाभ स्वरूप की उपासना की परंपरा के कारण पद्मा या पद्मनाभा नाम प्रचलित माना जाता है।

यहां दो भ्रम दूर करना जरूरी है।

  • पद्मा एकादशी और पद्मिनी एकादशी एक नहीं हैं। पद्मिनी एकादशी अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आती है, जबकि पद्मा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का ही एक नाम है।
  • इसी तरह केवल पद्म पुराण में एकादशी का माहात्म्य मिलने के आधार पर इसके नाम की व्याख्या करना पर्याप्त नहीं है। पद्मा नाम को भगवान के पद्मनाभ स्वरूप और कमल के वैष्णव प्रतीक से जोड़कर समझना अधिक उचित है।

गुजरात में देवपोढ़ी ग्यारस क्यों कहते हैं

गुजरात में यह पर्व ‘देवपोढ़ी एकादशी’ या ‘देवपोढ़ी ग्यारस’ के नाम से जाना जाता है। गुजराती बोली में एकादशी के लिए ‘ग्यारस’ शब्द का प्रयोग होता है, जबकि ‘पोढ़ना’ का भाव सोने या शयन करने से जुड़ा है। इस तरह देवपोढ़ी ग्यारस का अर्थ हुआ- देव के शयन की ग्यारस।

कई वैष्णव परिवारों और मंदिरों में इस दिन भगवान के लिए छोटी शय्या सजाई जाती है। उन्हें नए वस्त्र पहनाने और विधिपूर्वक शयन कराने की परंपरा भी देखने को मिलती है।

दक्षिण भारत में थोली एकादशी नाम कैसे पड़ा

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई हिस्सों में इसे ‘थोली’ या ‘टोली एकादशी’ कहा जाता है। तेलुगु में ‘थोली’ का अर्थ पहली अथवा आरंभिक माना जाता है। यह चातुर्मास के आरंभ की प्रमुख एकादशी है, इसलिए स्थानीय परंपरा में थोली एकादशी नाम लोकप्रिय हुआ।

कर्नाटक में शयनी, हरिशयनी और आषाढ़ी जैसे नाम सुनाई देते हैं। महाराष्ट्र से सटे क्षेत्रों में विट्ठल भक्ति और पंढरपुर वारी का प्रभाव भी दिखाई देता है।

ओडिशा की जगन्नाथ परंपरा में भगवान जगन्नाथ को श्रीहरि विष्णु का स्वरूप माना जाता है। मंदिर की अपनी विशिष्ट वार्षिक अनुष्ठान व्यवस्था है, जिसमें भगवान के विश्राम और शयन से जुड़े विधान भी आते हैं। हालांकि इन स्थानीय मंदिर अनुष्ठानों को हर जगह देवशयनी एकादशी की एक जैसी पूजा समझना उचित नहीं होगा।

क्या इसका सीधा उल्लेख वेदों में मिलता है

इस प्रश्न का उत्तर थोड़ा सावधानी से देना चाहिए। वेदों में भगवान विष्णु, ऋतुचक्र और चातुर्मास्य से जुड़े वैदिक अनुष्ठानों के उल्लेख मिलते हैं, लेकिन आज प्रचलित नाम, व्रत-कथा और पूजा-विधान के साथ ‘देवशयनी एकादशी’ का सीधा और पूरा वर्णन वेदों में नहीं मिलता।

इसका वर्तमान धार्मिक स्वरूप मुख्य रूप से पुराणों, व्रत-माहात्म्य ग्रंथों और वैष्णव परंपराओं से सामने आता है। देवशयनी एकादशी से संबंधित कथाएं पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण से जुड़ी व्रत-कथा परंपराओं में बताई जाती हैं। विभिन्न संस्करणों में संवाद के पात्र, अध्याय संख्या और कुछ विवरण अलग मिल सकते हैं, इसलिए किसी निश्चित श्लोक या अध्याय का उल्लेख प्रमाणित संस्करण देखकर ही करना चाहिए।

पंडित मयंक शर्मा कहते हैं कि पुराणों में एक ही पर्व के अलग नाम मिलना असामान्य नहीं है। कोई नाम तिथि से बनता है, कोई देवता के स्वरूप से और कोई उस क्षेत्र की लोकपरंपरा से। देवशयनी, हरिशयनी और आषाढ़ी नाम इसी विविधता के उदाहरण हैं, इनके पूजा-भाव में कोई विरोध नहीं है।

राजा मांधाता की कथा क्या संदेश देती है

देवशयनी एकादशी की लोकप्रिय व्रत-कथा में सूर्यवंशी राजा मांधाता का प्रसंग आता है। मान्यता के अनुसार उनके राज्य में लंबे समय तक वर्षा नहीं हुई। अन्न और जल का संकट गहराया तो राजा ने ऋषियों से समाधान पूछा।

ऋषि के निर्देश पर राजा और प्रजा ने आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत किया। इसके बाद वर्षा हुई और राज्य में फिर से अन्न-जल की समृद्धि लौटी।

इस कथा को केवल चमत्कार की तरह पढ़ने के बजाय उसके सामाजिक भाव को भी समझना चाहिए। यहां व्रत किसी एक व्यक्ति की इच्छा तक सीमित नहीं है। इसके साथ राजा का उत्तरदायित्व, प्रजा का कल्याण, प्रकृति का संतुलन और सामूहिक अनुशासन जुड़ा हुआ है।

देवशयनी एकादशी से क्या बदल जाता है

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इस एकादशी से:

  1. चातुर्मास का आरंभ माना जाता है।
  2. भगवान विष्णु की योगनिद्रा प्रारंभ होती है।
  3. विवाह जैसे मांगलिक संस्कारों पर परंपरागत विराम लग जाता है।
  4. साधु-संत यात्राएं सीमित कर एक स्थान पर निवास करते हैं।
  5. भक्त जप, पाठ, दान और सात्विक जीवन का संकल्प लेते हैं।
  6. भोजन और दिनचर्या में ऋतु के अनुसार संयम अपनाया जाता है।
  7. कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी तक विशेष साधना की जाती है।

अलग-अलग संप्रदायों और स्थानीय पंचांगों में चातुर्मास आरंभ करने की गणना या अवधि को लेकर कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए विशेष व्रत-संकल्प स्थानीय परंपरा और गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार किया जाता है।

भगवान सोते हैं, ताकि मनुष्य भीतर से जाग सके

देवशयनी एकादशी का सबसे सुंदर संदेश संभवतः यही है। वर्षा ऋतु के साथ प्रकृति की गति बदलती है। यात्राएं कम होती हैं, वातावरण में नमी बढ़ती है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी खान-पान में सावधानी की जरूरत होती है। ऐसे समय में धर्म ने संयम को पूजा से जोड़ दिया।

इस प्रकार देवशयनी, हरिशयनी, पद्मा, आषाढ़ी, महा एकादशी, देवपोढ़ी और थोली अलग-अलग एकादशियां नहीं हैं। ये आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एक ही पवित्र तिथि के अलग-अलग नाम और अलग-अलग सांस्कृतिक रंग हैं। कहीं भगवान का शयन मुख्य है, कहीं उनका हरि या पद्मनाभ स्वरूप और कहीं विट्ठल भक्ति की वारी- लेकिन आराध्य सभी के एक ही हैं, भगवान श्रीहरि विष्णु।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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