Som Pradosh Vrat Katha: जब प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है तो उसे प्रदोष सोम प्रदोष व्रत कहते हैं। सोमवार भगवान शिव का दिन है इसलिए इस दिन प्रदोष व्रत होने से उसकी महत्ता और भी अधिक बढ जाती है। 28 अगस्त को सावन का आखिरी प्रदोष व्रत (Sawan Ka Akhri Pradosh Vrat) रखा जाएगा। खास बात ये है कि इस दिन सावन के आखिरी सोमवार (Sawan Ka Akhri Somwar) का शुभ संयोग भी बना है। यहां आप जानेंगे सोम प्रदोष व्रत की कथा।
सोम प्रदोष व्रत कथा (Som Pradosh Vrat Katha)
एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। जिसके पति का स्वर्गवास हो गया था। अब उसका कोई आश्रयदाता नहीं था, इसलिए वह सुबह-सुबह ही अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल जाती थी। भिक्षाटन से ही वह खुद का और अपने पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी जब अपने घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई। वह लड़का कोई और नहीं विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बन्दी बनाकर उसके राज्य पर नियंत्रण कर लिया था, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था।
राजकुमार ब्राह्मणी के घर रहने लगा। एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वो उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उसके माता-पिता को भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने सपने में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। अंशुमति के माता-पिता ने भगवान शिव के आदेशा का पालन करते हुए उन दोनों का विवाह करा दिया।
ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव से और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बना दिया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही भगवान शिव अपने अन्य सभी भक्तों के दिन भी फेरते हैं।
