Sheetala Saptami ki Kahani, Sheetla Mata Saptmi ki Vrat Katha in Hindi: हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन पर शीतला सप्तमी का व्रत रखा जाता है। इसके अगले दिन शीतला अष्टमी यानी की बसौड़ा पर्व मनाया जाता है। आज 10 मार्च को शीतला माता सप्तमी है, इस दिन पर मां शीतला का विधि विधान के साथ पूजन होता है और उनको बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन का खास महत्व होता है। मान्यताओं के अनुसार माता शीतला की पूजा महामारियों से रक्षा करती है। कहा जाता है कि, जो कोई भी व्यक्ति शीतला सप्तमी पर व्रत रखकर माता शीतला की विधि विधान पूजा करता है उसे चेचक, बुखार, फोड़े-फुंसी और आंखों से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है। शीतला सप्तमी पर व्रत रखने वाले लोग जरूर पढ़ें माता शीतला की ये पौराणिक कथा। माता शीतला की पूजा और आरती करने से पहले शीतला माता सप्तमी की पौराणिक कथा/कहानी का पाठ जरूर ही करना चाहिए। यहां पढ़ें शीतला सप्तमी की कहानी क्या है, शीतला सप्तमी की कथा लिखित में -
शीतला सप्तमी की कहानी इन हिंदी
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय किसी राज्य के राजा के इकलौते पुत्र को शीतला (चेचक) का रोग हो गया। उसी राज्य में एक गरीब काछी परिवार का लड़का भी इसी बीमारी से पीड़ित था। काछी परिवार आर्थिक रूप से कमजोर जरूर था, लेकिन देवी भगवती का बहुत बड़ा भक्त था। जब उनके बेटे को शीतला हुई, तब भी परिवार ने पूजा-पाठ और नियमों का पालन पूरी श्रद्धा से किया। घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। बीमार बच्चे को सादा भोजन दिया जाता था। नमक खाने से परहेज किया जाता था और सब्जी में छौंक भी नहीं लगाया जाता था। घर में तली-भुनी और गर्म चीजें बिल्कुल नहीं बनती थीं।
इन नियमों का पालन करने की वजह से कुछ ही समय में काछी का बेटा धीरे-धीरे ठीक हो गया। उधर राजा ने अपने बेटे को ठीक करने के लिए बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठान करवाए। महल में देवी के लिए यज्ञ, हवन और शतचंडी पाठ कराए गए। राजपुरोहित भी पूजा-पाठ में लगे रहते थे। लेकिन इसके बावजूद राजमहल में रोज तरह-तरह के गर्म और स्वादिष्ट पकवान बनते थे। सब्जियों के साथ कई प्रकार के मांसाहारी व्यंजन भी तैयार किए जाते थे।
इन पकवानों की खुशबू से बीमार राजकुमार का मन भोजन की ओर आकर्षित हो जाता और वह खाने की जिद करने लगता। इकलौता पुत्र होने के कारण राजा उसकी हर इच्छा पूरी कर देता था। इसका परिणाम यह हुआ कि राजकुमार की बीमारी कम होने के बजाय और बढ़ने लगी। उसके शरीर पर बड़े-बड़े फोड़े निकल आए और उनमें तेज खुजली व जलन होने लगी। राजा ने शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन बीमारी शांत नहीं हो रही थी।
एक दिन राजा के गुप्तचरों ने बताया कि काछी का बेटा, जिसे शीतला हुई थी, अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है। यह सुनकर राजा बहुत हैरान हुआ। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इतने बड़े-बड़े अनुष्ठान करा रहा है, फिर भी उसका बेटा ठीक क्यों नहीं हो रहा। इसी चिंता में एक रात राजा को स्वप्न आया। सपने में श्वेत वस्त्र पहने देवी भगवती प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा, 'राजन्! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं, इसलिए तुम्हारा पुत्र अभी जीवित है। लेकिन तुम शीतला के समय रखे जाने वाले नियमों का पालन नहीं कर रहे हो। यही कारण है कि रोग शांत नहीं हो रहा। रोग के समय नमक का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे फोड़ों में खुजली बढ़ती है। भोजन सादा होना चाहिए और उसमें छौंक नहीं लगाना चाहिए। इसके अलावा रोगी को लोगों से दूर रखना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले।' देवी ने राजा को सही नियम बताए और फिर अंतर्ध्यान हो गईं।
सुबह उठकर राजा ने तुरंत देवी के बताए नियमों का पालन शुरू कर दिया। धीरे-धीरे राजकुमार की तबीयत में सुधार होने लगा और कुछ समय बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया। तभी से शीतला माता की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन देवी की पूजा के साथ भगवान श्री कृष्ण और माता देवकी का भी पूजन किया जाता है। मान्यता है कि विधिपूर्वक पूजा और कथा सुनने से रोग-दोष दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
