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Sawan Purnima Vrat Katha 2026: आज की शाम चंद्रमा अर्घ्य के बाद जरूर पढ़ें श्रावण पूर्णिमा व्रत कथा, जानिए क्या रहेगा आज का चंद्रोदय का समय

Sawan Purnima Vrat Katha 2026: आज 28 अगस्त को सावन की पूर्णिमा का व्रत रखा गया है। पूर्णिमा की पूजा शाम को चंद्रोदय के साथ की जाती है। आइए जानते हैं कि सावन पूर्णिमा व्रत कथा क्या है।

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सावन पूर्णिमा व्रत कथा

Sawan Purnima Vrat Katha 2026 : आज 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को सावन महीने की पूर्णिमा है। इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाता है। सावन पूर्णिमा पर व्रत, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा के साथ चंद्र देव को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्णिमा की रात चंद्रोदय के समय व्रत कथा सुने या पढ़े बिना यह व्रत अधूरा रहता है।

द्रिक पंचांग के अनुसार 28 अगस्त को चंद्रोदय शाम 6:58 बजे के आसपास होगा। अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय के समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। सावन पूर्णिमा की व्रत कथा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कथाएं सुनाई जाती हैं। इनमें 32 पूर्णिमा व्रत से जुड़ी यशोदा-कृष्ण कथा और राजा तुंगध्वज की सत्यनारायण कथा प्रमुख रूप से सुनाई जाती हैं।

आज कितने बजे करें चंद्र पूजा

द्रिक पंचांग के अनुसार चंद्रोदय शाम 6:58 बजे के आसपास होगा। चंद्रोदय के बाद चंद्र देव को जल, दूध या गंगाजल मिश्रित जल से अर्घ्य दिया जा सकता है। इसके बाद भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और अपने इष्ट देव का ध्यान करके व्रत कथा पढ़ी या सुनी जा सकती है। द्वापर युग में एक दिन माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण से स्त्रियों के सौभाग्य और सुखी जीवन के लिए श्रेष्ठ व्रत के बारे में पूछा। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि ऐसा कौन सा व्रत है, जिसे करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य मिले और परिवार में सुख-शांति बनी रहे।

माता यशोदा के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ने 32 पूर्णिमा व्रत का विधान बताया। उन्होंने कहा कि इस व्रत की शुरुआत सावन पूर्णिमा से की जाती है। इसके बाद लगातार 32 पूर्णिमाओं तक व्रत रखकर भगवान विष्णु और चंद्र देव की पूजा की जाती है। व्रत पूरा होने पर उद्यापन किया जाता है। ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दान दिया जाता है। इस व्रत को करने से सौभाग्य बढ़ता है और परिवार के संकट दूर होते हैं।

धनेश्वर ब्राह्मण की कथा

सावन पूर्णिमा से जुड़ी एक अन्य कथा धनेश्वर नाम के ब्राह्मण की है। धनेश्वर अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहता था। उसके पास धन-दौलत की कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह हमेशा परेशान रहता था। एक दिन उसके नगर में एक तपस्वी पहुंचे। तपस्वी धनेश्वर के घर को छोड़कर दूसरे घरों से भिक्षा लेते थे। धनेश्वर ने इसका कारण पूछा तो तपस्वी ने कहा कि संतानहीन व्यक्ति के घर से भिक्षा लेने से वे बचते हैं। धनेश्वर को यह बात बहुत दुखी कर गई। उसने तपस्वी से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। तपस्वी ने उसे देवी चंडी की पूजा करने के लिए कहा। धनेश्वर जंगल में चला गया और वहां देवी चंडी की आराधना शुरू कर दी। उसने लगातार 16 दिन तक पूजा और व्रत किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी चंडी ने उसे दर्शन दिए।

देवी ने धनेश्वर को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया, लेकिन बताया कि उसका पुत्र केवल 16 वर्ष तक जीवित रहेगा। धनेश्वर यह सुनकर परेशान हो गया।

तब देवी ने उसे 32 पूर्णिमा का व्रत करने के लिए कहा। देवी ने बताया कि इस व्रत को विधि से करने पर उसके पुत्र की आयु बढ़ सकती है। इसके साथ आटे के दीपक बनाकर भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान बताया। धनेश्वर घर लौट आया और पत्नी को पूरी बात बताई। कुछ समय बाद उसके घर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम देवीदास रखा गया।

16 साल की उम्र में देवीदास पर आया संकट

देवीदास जब 16 वर्ष का होने लगा तो उसके माता-पिता को उसकी चिंता सताने लगी। उसे शिक्षा के लिए उसके मामा के साथ काशी भेजा गया। रास्ते में दोनों एक गांव में रुके। उसी गांव में एक ब्राह्मण की बेटी का विवाह होना था। विवाह के दिन वर की तबीयत अचानक खराब हो गई। स्थिति बिगड़ने पर लड़की के परिवार ने देवीदास से विवाह कराने का फैसला किया। देवीदास का विवाह हो गया। इसके बाद जब उसके जीवन पर संकट आया तो 32 पूर्णिमा के व्रत के प्रभाव से उसकी रक्षा हुई। कथा के अनुसार देवीदास को दीर्घायु प्राप्त हुई और उसके परिवार की चिंता दूर हो गई।

राजा तुंगध्वज की कथा भी पढ़ें या सुनें

पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनने की भी परंपरा है। इसमें राजा तुंगध्वज का प्रसंग आता है। राजा तुंगध्वज एक दिन जंगल में शिकार करने गया था। वहां उसने कुछ ग्वालों को भगवान सत्यनारायण की पूजा करते देखा। राजा ने पूजा में हिस्सा नहीं लिया और वहां से चला गया। पूजा के बाद ग्वालों ने उसे प्रसाद दिया, लेकिन राजा ने प्रसाद ग्रहण नहीं किया। राजा के महल पहुंचने तक उसके राज्य पर बड़ा संकट आ गया। धन-संपत्ति नष्ट हो गई और उसके परिवार को भी भारी नुकसान हुआ। राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह वापस ग्वालों के पास गया और उनके साथ भगवान सत्यनारायण की पूजा की। कथा के अनुसार भगवान प्रसन्न हुए और राजा का राज्य, धन-संपत्ति और परिवार का सुख वापस लौट आया।

सावन पूर्णिमा पर चंद्र देव को अर्घ्य देने से लाभ

पूर्णिमा के दिन चंद्र देव की पूजा की जाती है। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने से मन में सुख-शांति और परिवार की खुशहाली आती है। ज्योतिषीय मान्यता में चंद्रमा को मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति का कारक माना गया है। चंद्रमा को अर्घ्य देने और पूजा करने को चंद्र दोष भी शांत होता है। के लिए भी किया जाता है।

सावन पूर्णिमा की रात ऐसे करें पूजा

चंद्रोदय के बाद सबसे पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थल पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव का ध्यान करें। इसके बाद चंद्रमा को जल अर्पित करें। पूजा में सफेद फूल, अक्षत और मिठाई अर्पित की जा सकती है। भगवान विष्णु को तुलसी दल चढ़ाएं। इसके बाद सावन पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें। पूजा और कथा के बाद अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन पूर्णिमा का व्रत और कथा सुख-शांति, सौभाग्य, परिवार मे समृद्धि आती है और मनोकामना पूर्ति होती है।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी मान्यताओं और पुराणों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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