Flowers For God: फूलों से सज रहे हैं श्री वृंदावन बिहारी....भगवान की साधना- उपासना में फूलों का वही महत्व है जो महत्व है आस्था और विश्वास का। प्रभु के श्री चरणाें में पुष्पांजलि अर्पित करने से इष्ट प्रसन्न होते हैं। गुलाब, गेंदा, कमल जैसे फूलाें को आतमौर पर श्रीचरणाें में अर्पित किया जाता है। लेकिन अनजाने में कुछ ऐसे फूल हम अर्पित कर देते जिन्हें पितरों को अर्पित करने का विधान है। कौन से पुष्प अर्पित करें, कैसे करें इस बारे में विस्तृत जानकारी...।
भगवान को कैसे फूल चढ़ाएं
भगवान को ताजे, बिना मुरझाए और बिना कीड़ों के खाए हुए फूल डंठलों सहित चढ़ाने चाहिए। फूलों को देव मूर्ति की तरफ करके उन्हें उल्टा अर्पित करें। बेल का पत्ता भी उल्टा अर्पण करें। बेल एवं दूर्वा का अग्रभाग अपनी ओर होना चाहिए। उसे मूर्ति की तरफ न करें। तुलसीपत्रमंजरी के साथ होना चाहिए। कुछ देवताओं के लिए कुछ फूल निषिद्ध माने गए हैं।
भगवान भाेलेनाथ
शंकर जी के लिए केवड़ा, बकुली एवं कुंद के फूल निषिद्ध हैं। कुछ प्रदेशाें में तुलसी भी वर्जित मानी जाती है परंतु इसके लिए किसी तरह का शास्त्राधार नहीं है। शालिग्राम पर चढ़ी तुलसी शंकर जी को अत्यंत प्रिय है।
गणपति
गणपति काे तुलसी के फूल न चढ़ाएं। परंतु गणेश चतुर्थी के दिन सफेद तुलसी अवश्य चढ़ाएं।
पितर
पितरों के निमित्त् श्राद्ध के दिन लाल फूल निषिद्ध होते हैं।
दुर्गा देवी
दुर्गा देवी को दूर्वा अर्पित करना मना है। तथापि चंडी हाेम के लिए दूर्वा आवश्यक मानी जाती है।
विष्णु भगवान
विष्णु पूजन में बेलपत्रों का उपयोग नहीं किया जाता है।
न चढ़ाएं बासी फूल
सामान्यता बासी फूल देवताओं को कभी भी समर्पित नहीं किए जाते। शास्त्रों में प्रत्येक फूल के बासी होने का समय निश्चित किया गया है। उसमें से तुलसी कभी बासी नहीं होती, वह सदैव ग्राह्य है। बेल 30 दिन, चाफा 9 दिन, मोगरा 4 दिन, कनेर 8 दिन, शमी 6 दिन, केवड़ा 4 दिन, और कमल के फूल 8 दिन बाद बासी होते हैं। खराब, सड़े गले, चोटी पर से उतारे हुए एवं पर्युषित फूल वर्जित माने जाते हैं। लेकिन माली के यहां बचे फूल एवं पत्र कभी बासी नहीं होते।
इस तरह करें पुष्प अर्पित
भगवान का निर्माल्य निकालते समय तर्जनी एवं अंगुष्ठ का उपयोग करें। भगवान को फूल चढाते समय अंगूठा, मध्यमा एवं अनामिका का प्रयोग करना चाहिए। कनिष्ठिका का उपयाेग करने से बचें?
तुलसी विष्णुप्रिय, दूर्वा गणेश प्रिय एवं बेल शिव प्रिय है। अमुक भ्गवान के तिथि एवं वार को उपरोक्त दिए निर्दिष्ट पेडों की पत्ती न तोडें। चतुर्थी तो दूर्वा, एकादशी को तुलसी और प्रदोष के दिन बेल के पत्र आदि नहीं तोड़ने चाहिए।
डिस्क्लेमर : यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।
