Pitru Tarpan Mantra And Vidhi: पितृपक्ष में पितरों की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए तर्पण किया जाता है। तर्पण में जल, तिल, कुश और अन्य सामग्री के माध्यम से देवताओं, ऋषियों और पितरों को जल अर्पित किया जाता है। तर्पण करते समय दिशा, जनेऊ की स्थिति, कुश रखने का तरीका और जल अर्पित करने की विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है। तर्पण में हर प्रियजन के तर्पण के लिए अलग-अलग मंत्र का जाप करना चाहिए। आइए जानते हैं कि तर्पण की शुरुआत से लेकर देव तर्पण, ऋषि तर्पण, पितृ तर्पण, यम तर्पण, भीष्म तर्पण और सूर्य को अर्घ्य देने तक की पूरी विधि और मंत्र क्या है।
तर्पण के लिए किस पात्र का इस्तेमाल करें
तर्पण के लिए सोने, चांदी, तांबे या कांसे के पात्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। मिट्टी और लोहे के पात्र को तर्पण के लिए उचित नहीं माना गया है। तर्पण में कुश का भी विशेष महत्व होता है। देवताओं के तर्पण में कुश के अग्रभाग (आगे), मनुष्यों के तर्पण में मध्य भाग (बीचका) और पितरों के तर्पण में मूल भाग (नीचे) का प्रयोग किया जाता है।
तर्पण शुरू करने से पहले करें ये काम
तर्पण शुरू करने से पहले गायत्री मंत्र का स्मरण करते हुए शिखा (चोटी) बांधें और तिलक लगाएं। दाहिनी अनामिका के मध्य पोर में दो कुश और बाईं अनामिका में तीन कुश धारण करें। इसके बाद हाथ में कुश, जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें। संकल्प में माता-पिता का नाम, अपना नाम और कुल-गोत्र बोलते हुए पितरों की प्रसन्नता और आशीर्वाद की कामना करें। इसके साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए देव, ऋषि, मनुष्य और पितृ तर्पण करने का संकल्प लिया जाता है।
तर्पण का संकल्प मंत्र
‘मैं आज ........ (माता का नाम) नामक माता तथा ........ (पिता का नाम) नामक पिता का ........ (अपना नाम) नामक पुत्र, अपने समस्त कुल-गोत्र के पितरों की प्रसन्नता एवं आशीर्वाद प्राप्ति हेतु तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति हेतु अपने घर में देवर्षि, मनुष्य, पितृ तर्पण करने का संकल्प करता हूं।’
संकल्प के बाद देव और ऋषियों का आवाहन करें। इसके लिए हाथ में जल और चावल लेकर कुश को पूर्व दिशा की ओर रखें और यह मंत्र पढ़ें।
‘ब्रह्मादयः सुराः सर्वे ऋषयः सनकादयः।
आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदरवर्तिनः॥’
देव तर्पण की विधि
देव तर्पण करते समय पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें। जनेऊ बाएं कंधे पर रहे और दाहिना घुटना जमीन से लगा हो। अर्घ्य पात्र में चावल रखें और तीन कुशों को पूर्व दिशा की ओर करके रखें। देवताओं को दाहिने हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग से जल अर्पित किया जाता है। प्रत्येक नाम के साथ एक-एक अंजलि जल देते हुए अंत में ‘तृप्यताम्’ का उच्चारण करें।
देव तर्पण के मंत्र
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्।
ॐ विष्णुस्तृप्यताम्।
ॐ रुद्रस्तृप्यताम्।
ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्।
ॐ देवास्तृप्यन्ताम्।
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ देवास्तृप्यन्ताम्।
ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्।
ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम्।
ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्।
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्।
ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्।
ॐ नागास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्।
ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्।
ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्।
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सुवर्णास्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्।
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्।
ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ औषधयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्॥
ऋषि तर्पण की विधि
देव तर्पण के बाद मरीचि, अत्रि, अंगिरा सहित ऋषियों का तर्पण करें। प्रत्येक मंत्र के साथ एक-एक अंजलि जल अर्पित किया जाता है।
ऋषि तर्पण के मंत्र
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्।
ॐ अत्रिस्तृप्यताम्।
ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्।
ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्।
ॐ पुलहस्तृप्यताम्।
ॐ क्रतुस्तृप्यताम्।
ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्।
ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्।
ॐ भृगुस्तृप्यताम्।
ॐ नारदस्तृप्यताम्।
दिव्य मनुष्य तर्पण कैसे करें
अब उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें। जनेऊ और गमछे को माला की तरह गले में रखें। इस दौरान दोनों घुटने जमीन से ऊपर रहें। अर्घ्य पात्र में जौ रखें और तीन कुशों को उत्तर दिशा की ओर रखें। प्रजापत्य तीर्थ यानी दाहिने हाथ की कनिष्ठिका के मूल भाग से प्रत्येक मंत्र के साथ दो-दो बार जल अर्पित करें।
दिव्य मनुष्य तर्पण मंत्र
ॐ सनकस्तृप्यताम् — 2।
ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् — 2।
ॐ सनातनस्तृप्यताम् — 2।
ॐ कपिलस्तृप्यताम् — 2।
ॐ आसुरिस्तृप्यताम् — 2।
ॐ वोढुस्तृप्यताम् — 2।
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् — 2।
दिव्य पितृ तर्पण की विधि
दिव्य पितृ तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुंह करें। जनेऊ को दाहिने कंधे पर लेकर अपसव्य करें। गमछा दाहिने कंधे पर रखें और बायां घुटना जमीन पर लगाकर बैठें। अर्घ्य पात्र में काले तिल रखें। कुश को बीच से मोड़कर उसकी जड़ और अग्रभाग को दाहिने हाथ में अंगूठे और तर्जनी के बीच रखें। इसके बाद पितृतीर्थ से तीन-तीन अंजलि जल अर्पित करें।
दिव्य पितृ तर्पण मंत्र
ॐ कव्यवाहनलस्तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
ॐ सोमस्तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
ॐ यमस्तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
ॐ अर्यमा तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्। इदं गङ्गाजलं तेभ्यः स्वधा — 3।
ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। इदं गङ्गाजलं तेभ्यः स्वधा — 3।
ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्। इदं गङ्गाजलं तेभ्यः स्वधा — 3।
यम तर्पण के 14 मंत्र
दिव्य पितृ तर्पण के बाद यम तर्पण किया जाता है। प्रत्येक नाम के साथ पितृतीर्थ से तिल मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलि अर्पित करें।
ॐ यमाय नमः — 3।
ॐ धर्मराजाय नमः — 3।
ॐ मृत्यवे नमः — 3।
ॐ अन्तकाय नमः — 3।
ॐ वैवस्वताय नमः — 3।
ॐ कालाय नमः — 3।
ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः — 3।
ॐ औदुम्बराय नमः — 3।
ॐ दध्नाय नमः — 3।
ॐ नीलाय नमः — 3।
ॐ परमेष्ठिने नमः — 3।
ॐ वृकोदराय नमः — 3।
ॐ चित्राय नमः — 3।
ॐ चित्रगुप्ताय नमः — 3।
अपने पितरों को तर्पण देने की विधि
अब अपने पितरों का तर्पण करें। पितृतीर्थ से तिल मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलि देते हुए संबंधित पितर का नाम और गोत्र बोलें। पिता, दादा, परदादा और आगे की पीढ़ियों के साथ माता, दादी, परदादी तथा अन्य संबंधियों के लिए भी तर्पण किया जाता है।
पिता के लिए
मम पिता तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
पितृव्य यानी पिता के भाई के लिए
मम पितृव्यः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
दादा के लिए
मम पितामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
परदादा के लिए
मम प्रपितामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
वृद्ध प्रपितामह के लिए
मम वृद्धप्रपितामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
माता के लिए
मम माता तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
दादी के लिए
मम पितामही तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
परदादी के लिए
मम प्रपितामही तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
सौतेली माता के लिए
मम सावत्रमाता तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
नाना-नानी और ननिहाल पक्ष के पितरों को तर्पण
ननिहाल पक्ष के पितरों के लिए दूसरे गोत्र का उच्चारण करते हुए तर्पण किया जाता है। नाना, परनाना, वृद्ध परनाना, नानी, परनानी और वृद्ध परनानी के लिए तीन-तीन अंजलि जल अर्पित करें।
मम मातामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
मम प्रमातामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
मम वृद्धप्रमातामहः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 3।
मम मातामही तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
मम प्रमातामही तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
मम वृद्धप्रमातामही तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 3।
पत्नी, पुत्र-पुत्री और अन्य संबंधियों का तर्पण
पत्नी, पुत्र, पुत्री, भाई, बुआ, मौसी और श्वशुर आदि संबंधियों के लिए एक-एक अंजलि जल देने की विधि है। संबंधित व्यक्ति का नाम और गोत्र बोलकर मंत्र का पाठ करें।
मम भार्या तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 1।
मम पुत्रः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 1।
मम पुत्री तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 1।
मम भ्राता तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 1।
मम पितृष्वसा तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 1।
मम मातृष्वसा तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्यै स्वधा — 1।
मम श्वशुरः तृप्यताम्। इदं गङ्गाजलं तस्मै स्वधा — 1।
सभी जीवों और अज्ञात संबंधियों के लिए तर्पण
अब पूर्व दिशा की ओर मुंह करके देव तर्पण की तरह जनेऊ सव्य रखें और दाहिना घुटना भूमि पर लगाएं। इसके बाद नीचे दिए मंत्र का पाठ करते हुए जल अर्पित करें।
'देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसाः।
पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥
जलेचरा भूचराः वाय्वाधाराश्च जन्तवः।
तृप्तिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुना अखिलाः॥'
इसके बाद जनेऊ को अपसव्य करके दक्षिण दिशा की ओर मुंह करें और बायां घुटना भूमि पर लगाएं। अब उन जीवों और संबंधियों के लिए जल अर्पित करें जो किसी कारण से तर्पण से वंचित रह गए हों।
नरक में स्थित जीवों के लिए
'नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥'
इस या पूर्व जन्म के संबंधियों के लिए
'येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्च मत्तोऽभिवाञ्छति॥'
जिनके पुत्र-पौत्र नहीं हैं
'ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः।
तेषां हि दत्तमक्षय्यमिदमस्तु॥'
सभी पितरों के लिए
'आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥'
पूर्व की पीढ़ियों के पितरों के लिए
'अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्।
आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥'
वस्त्र निष्पीडन कैसे करें
पितरों का तर्पण पूरा होने के बाद अंगोछे या वस्त्र को चार तह में लपेटकर उसमें जल और तिल डालें। इसके बाद बाईं ओर पृथ्वी पर वस्त्र को निचोड़ते हुए यह मंत्र पढ़ें।
'ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥'
यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म चल रहा हो तो वस्त्र निष्पीडन नहीं करना चाहिए।
भीष्म तर्पण की विधि
इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जनेऊ अपसव्य करें। हाथ में कुश लेकर पितृतीर्थ से तिल मिश्रित जल अर्पित करें। भीष्म तर्पण के दौरान यह मंत्र पढ़ें।
'भीष्मः शान्तनवो वीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः।
आभीरवदिरवाप्नोतु पुत्रपौत्रोचितां क्रियाम्॥'
सूर्यदेव को अर्घ्य देने की विधि
तर्पण पूरा होने के बाद शुद्ध जल से आचमन और प्राणायाम करें। फिर एक पात्र में शुद्ध जल लेकर उसमें चंदन और पुष्प डालें। सूर्यदेव को अर्घ्य देते समय यह मंत्र पढ़ें।
'एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्प्य मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥'
इसके बाद नीचे दिए मंत्रों के साथ एक-एक जलांजलि दें।
ॐ ब्रह्मणे नमः।
ॐ अग्नये नमः।
ॐ पृथिव्यै नमः।
ॐ औषधिभ्यो नमः।
ॐ वाचे नमः।
ॐ महद्भ्यो नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ अद्भ्यो नमः।
ॐ अपांमृतये नमः।
ॐ वरुणाय नमः।
तर्पण के बाद भगवान को कर्म समर्पित करें
संपूर्ण तर्पण विधि पूरी होने के बाद अपने किए गए कर्म को भगवान को समर्पित करें। इसके लिए यह मंत्र पढ़ें।
'अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाख्येन कर्मणा भगवान् पितृस्वरूपी जनार्दन वासुदेवः प्रीयतां न मम।'
इसके बाद भगवान से अपनी पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें।
क्षमा प्रार्थना मंत्र
'मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
यदक्षरं पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर॥'
तर्पण करते समय इन बातों का रखें ध्यान
तर्पण में दिशा और जनेऊ की स्थिति का विशेष ध्यान रखें। देव तर्पण के समय पूर्व दिशा की ओर मुंह करके जनेऊ सव्य रखें, जबकि पितृ तर्पण के समय दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जनेऊ अपसव्य किया जाता है। देव तर्पण में चावल, दिव्य मनुष्य तर्पण में जौ और पितृ तर्पण में काले तिल का इस्तेमाल किया जाता है। जल अर्पित करने के लिए देवताओं के लिए देवतीर्थ और पितरों के लिए पितृतीर्थ का प्रयोग करें।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी Tarpan Vidhi पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
