Indira Ekadashi ki katha, इंदिरा एकादशी व्रत कथा इन हिंदी: हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन पर इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। पितृ पक्ष की पहली एकादशी की तिथि पर आज पितरों की आत्मा को मोक्ष दिलाने हेतु व्रत किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत करने से बड़े बड़े दुखों का निवारण हो जाता है और जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है। इंदिरा एकादशी का व्रत करने से सात पीढ़ियों के पितरों के कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें वैकुंठ में वास प्राप्त होता है।
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इंदिरा एकादशी पर विधि विधान के साथ पूजा और व्रत करने के साथ साथ एकादशी की कथा का पाठ करने का भी बहुत महत्व है। यहां पढ़ें 6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी की कथा, एकादशी व्रत की कहानी क्या है, आज इंदिरा एकादशी व्रत की कथा इन हिंदी।
Indira Ekadashi ki katha, इंदिरा एकादशी की कथा इन हिंदी
एक समय भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय सखा अर्जुन ने विनम्र भाव से उनसे पूछा, 'हे प्रभु! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत को करने से मनुष्य को कौन-कौन से पुण्य और लाभ प्राप्त होते हैं? कृपया इसकी पूरी कथा और व्रत की विधि मुझे विस्तार से बताइए।' भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, 'हे अर्जुन! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी विशेष रूप से पितरों की मुक्ति से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका व्रत करने से व्यक्ति के पाप कर्मों का क्षय होता है और जिन पितरों को अपने कर्मों के कारण कष्ट भोगना पड़ रहा हो, उनके उद्धार का मार्ग प्रशस्त होता है। अब मैं तुम्हें इससे जुड़ी प्राचीन कथा सुनाता हूं।'
प्राचीन समय में महिष्मती नाम की नगरी में इन्द्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा का शासन था। राजा बहुत धर्मनिष्ठ और प्रजा का हित चाहने वाला था। उसके राज्य में सुख-समृद्धि थी। उसके परिवार में पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की भी कोई कमी नहीं थी। उसकी वीरता से शत्रु भी भय खाते थे। एक दिन राजा अपने राजदरबार में बैठा था। उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे। राजा ने तुरंत अपने आसन से उठकर उनका स्वागत किया, प्रणाम किया और उन्हें सम्मानपूर्वक आसन प्रदान किया।
राजा ने नारदजी से कुशल-क्षेम पूछा और कहा, 'हे देवर्षि! आपके दर्शन से मैं धन्य हो गया। कृपया बताइए कि आपके आगमन का क्या कारण है? यदि मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं तो मुझे अवश्य बताइए।' नारद मुनि ने राजा से कहा, 'राजन! तुम्हारे राज्य में सब कुछ ठीक है और तुम्हारी धर्म के प्रति निष्ठा देखकर मैं प्रसन्न हूं। लेकिन आज मैं तुम्हें एक ऐसी बात बताने आया हूं जिसे सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा'
नारदजी ने बताया, 'एक बार मैं ब्रह्मलोक से यमलोक गया था। वहां मैंने यमराज की सभा में तुम्हारे पिता को देखा। वे ज्ञानी, दानी और धार्मिक व्यक्ति थे, फिर भी एक विशेष कारण से उन्हें यमलोक में रहना पड़ा।' यह सुनकर राजा चिंतित हो गया। उसने तुरंत पूछा, “महर्षि, मेरे पिता को ऐसा कौन-सा कष्ट भोगना पड़ रहा है? कृपया इसका कारण बताइए।”
देवर्षि नारद ने कहा, तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने बताया कि पूर्व जन्म के किसी कर्म के कारण उन्हें यह स्थिति प्राप्त हुई है। उनका कहना है कि यदि उनका पुत्र आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करे और उस व्रत का पुण्य उन्हें समर्पित कर दे, तो उन्हें इस अवस्था से मुक्ति मिल सकती है। पिता की स्थिति जानकर राजा इन्द्रसेन बहुत दुखी हुआ। उसने नारदजी से कहा, हे देवर्षि! मैं अपने पिता की मुक्ति के लिए हर संभव प्रयास करूंगा। कृपया मुझे इन्दिरा एकादशी का सही विधान बताइए।
नारदजी ने राजा को व्रत का विधान समझाते हुए कहा कि दशमी तिथि से ही इसकी तैयारी शुरू करनी चाहिए। दशमी के दिन प्रातः स्नान करके शुद्धता के साथ दिन बिताना चाहिए। दोपहर के समय भी स्नान करके पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। इस दिन सात्विक भाव से एक समय भोजन करने और रात्रि में भूमि पर विश्राम करने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए। भक्त को अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास करते हुए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि व्रत बिना किसी बाधा के पूरा हो।
मध्याह्न के समय भगवान शालिग्राम की पूजा करने, ब्राह्मण को भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देने की परंपरा है। भोजन का कुछ अंश गाय को अर्पित करने की भी मान्यता बताई गई है। इसके बाद भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजा करनी चाहिए और रात में जागरण करते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए। द्वादशी के दिन व्रत का पारण किया जाता है। परंपरा के अनुसार परिवार और संबंधियों के साथ भोजन करके व्रत पूर्ण किया जाता है।
नारदजी ने राजा से कहा, यदि तुम पूरी श्रद्धा से इन्दिरा एकादशी का व्रत करोगे और उसका पुण्य अपने पिता को समर्पित करोगे, तो उनके लिए मुक्ति का मार्ग खुल जाएगा। राजा इन्द्रसेन ने नारदजी द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। उसने पूरे भक्तिभाव से भगवान विष्णु की पूजा की और व्रत का पुण्य अपने पिता को अर्पित किया।
कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से राजा के पिता को यमलोक से मुक्ति मिली और वे दिव्य रथ पर सवार होकर स्वर्गलोक चले गए। उस समय राजा के ऊपर पुष्पों की वर्षा हुई और उसके परिवार में भी प्रसन्नता छा गई। कहा जाता है कि इन्दिरा एकादशी के पुण्य से राजा इन्द्रसेन ने भी अपने जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त की और अंत समय में उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, 'हे सखा! इन्दिरा एकादशी की यह कथा श्रद्धा से सुनने और पढ़ने वाला व्यक्ति पुण्य का भागी बनता है। यह व्रत विशेष रूप से पितरों के प्रति श्रद्धा और उनके कल्याण की भावना से जुड़ा है। जो मनुष्य भक्ति और विश्वास के साथ इस कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन में भगवान की कृपा बनी रहती है।'
