Harishankari Lagane ke Fayde : भारत की सनातन परंपरा में पेड़-पौधों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवतुल्य सम्मान दिया गया है। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण को धर्म और अध्यात्म से जोड़कर देखा। आज 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। कुछ ऐसे पौधे हैं, जिनको स्वयं ईश्वर का स्वरूप माना गया है। इनमें से ही एक हरिशंकरी है। यह कोई एक पौधा नहीं बल्कि तीन पौधों का एक समूह है। ये एक साथ लगाए जाते हैं और वृक्ष एक तने के रूप में दिखाई देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरिशंकरी का रोपण करने से त्रिदेवों की कृपा प्राप्त होती है, पितृदोष शांत होता है और व्यक्ति को अनेक पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। वहीं, पर्यावरण की दृष्टि से भी यह प्रकृति के लिए एक बड़ा वरदान माना जाता है। इस कारण विश्व पर्यावरण दिवस पर हरिशंकरी लगाना धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से अच्छा माना जाता है।
क्या है हरिशंकरी (Kya Hai Harishankari)
हरिशंकरी कोई एक वृक्ष नहीं है, बल्कि तीन पवित्र वृक्षों पीपल, बरगद और पाकड़ (पलाश) का संयुक्त स्वरूप है। इन तीनों पौधों को एक ही स्थान पर या बहुत कम दूरी पर लगाया जाता है। समय के साथ जब ये वृक्ष बड़े होते हैं तो उनकी शाखाएं और तने आपस में इस प्रकार मिल जाते हैं कि वे एक ही विशाल वृक्ष के रूप में दिखाई देने लगते हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर, मऊ और आसपास के क्षेत्रों में हरिशंकरी लगाने की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है। गांवों में आज भी कई स्थानों पर सदियों पुराने हरिशंकरी वृक्ष लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं।
क्यों कहा जाता है हरिशंकरी
'हरिशंकरी' नाम भी अपने आप में बेहद खास है। 'हरि' यानी भगवान विष्णु और 'शंकर' यानी भगवान शिव। जबकि पाकड़ (पलाश) को ब्रह्मा जी का स्वरूप माना गया है। इन तीनों पौधों को त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप माना गया है। हरिशंकरी में ये तीनों पौधे समाहित होते हैं। इस कारण हरिशंकरी त्रिदेवों का ही रूप है।
मत्स्य पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि पीपल में भगवान विष्णु, बरगद में भगवान शिव और पाकड़ में ब्रह्मा जी का वास माना गया है। इस कारण इन तीनों वृक्षों का एक साथ रोपण करना त्रिदेवों की सामूहिक उपासना के समान माना जाता है।
दूर होता है पितृदोष
ज्योतिषाचार्य पं. सत्यम विष्णु अवस्थी के अनुसार ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में पीपल और बरगद का संबंध पितरों से माना जाता है। कहा जाता है कि हरिशंकरी वृक्ष की सेवा, नियमित जल अर्पित करने और उसके नीचे दीपक जलाने से पितरों को तृप्ति मिलती है। जिन लोगों की कुंडली में पितृदोष होता है या जिन्हें बार-बार पारिवारिक समस्याओं, आर्थिक बाधाओं और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है, उन्हें हरिशंकरी का रोपण या सेवा करनी चाहिए। इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आने लगते हैं।

हरिशंकरी क्यों हैं खास
पापों का होता है नाश
पं सत्यम विष्णु अवस्थी की मानें तो सनातन धर्म में वृक्षारोपण को सबसे बड़े दानों में से एक माना गया है। एक वृक्ष अपने जीवनकाल में हजारों जीवों को आश्रय, भोजन और प्राणवायु देता है। ऐसे में हरिशंकरी जैसे विशाल और दीर्घायु वृक्ष का रोपण कई गुना अधिक पुण्यदायी माना जाता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति हरिशंकरी लगाता है, उसकी देखभाल करता है और लोगों को उसकी छाया का लाभ मिलता है, उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इसे पापों का नाश करने वाला और मोक्षदायी वृक्ष भी कहा जाता है। हरिशंकरी को रोपण सभी प्रकार के पापों को नष्ट करता है। इसके साथ ही हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। इन पौधों की सेवा करने से ग्रहदोष भी मिट जाता है।
जीव-जंतुओं के लिए भी है वरदान
हरिशंकरी केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं के लिए भी जीवनदाता है। इसके घने वृक्षों पर पक्षी घोंसले बनाते हैं, फल खाने वाले जीवों को भोजन मिलता है और गर्मी में तमाम पशु इसकी छाया में विश्राम करते हैं। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति जीवों के लिए आश्रय का निर्माण करता है, उसे विशेष पुण्य मिलता है। इस दृष्टि से हरिशंकरी का रोपण किसी बड़े दान से कम नहीं माना जाता है।
औषधीय दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण
चरक संहिता और अष्टांग संग्रह जैसे आयुर्वेद शास्त्रों में पीपल, बरगद और पाकड़ तीनों का विशेष महत्व बताया गया है। इसमें पीपल को श्वसन संबंधी समस्याओं में उपयोगी माना गया है। बरगद को शक्ति और स्वास्थ्य बढ़ाने वाला वृक्ष कहा गया है। वहीं, पाकड़ को शीतल प्रकृति वाला माना जाता है, जो पित्त, कफ और रक्त विकारों को संतुलित करने में सहायक माना जाता है। इन वृक्षों की छाल, पत्तियां और अन्य भाग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में लंबे समय से उपयोग किए जाते रहे हैं।
क्या कहती है रिसर्च
हरिशंकरी में शामिल पीपल, बरगद और पाकड़ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक नजरिए से भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हाल के वर्षों में इन वृक्षों पर कई रिसर्च हुई हैं। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल के शोध में पाया गया कि पीपल और बरगद के जीनोम में लगभग 25 हजार जीन मौजूद हैं, जो इन्हें लंबे समय तक जीवित रहने और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में मदद करते हैं। विभिन्न फार्माकोलॉजिकल अध्ययनों में इन वृक्षों की छाल, पत्तियों और फलों में एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-इन्फ्लेमेटरी (सूजनरोधी) और रोगाणुरोधी गुण पाए गए हैं।
प्रीक्लिनिकल रिसर्च में यह भी देखा गया कि पीपल की छाल में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं। वहीं इसके पत्तों और छाल में अल्सर, पेचिश और पाचन संबंधी समस्याओं से लड़ने वाले गुण भी पाए गए हैं। बरगद और पीपल की छाल पर हुए अध्ययनों में घाव भरने, मसूड़ों को मजबूत करने और त्वचा संबंधी समस्याओं में लाभकारी प्रभाव देखे गए हैं। कुछ शोधों में पीपल की छाल के अर्क को स्मरण शक्ति और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं, यहां तक कि अल्जाइमर जैसी बीमारियों पर संभावित रूप से उपयोगी बताया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन गुणों की पुष्टि के लिए अभी और व्यापक क्लीनिकल रिसर्च की आवश्यकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि हरिशंकरी में शामिल ये तीनों वृक्ष औषधीय दृष्टि से भी बेहद मूल्यवान हैं।
क्यों लगानी चाहिए हरिशंकरी
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में हरिशंकरी का रोपण केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी एक मजबूत कदम है। पीपल, बरगद और पाकड़ तीनों ही लंबे समय तक जीवित रहने वाले विशाल वृक्ष हैं। ये बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, पर्यावरण को शुद्ध बनाते हैं और जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। एक हरिशंकरी वृक्ष आने वाली कई पीढ़ियों को छाया, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक संतुलन प्रदान कर सकता है।
हरिशंकरी लगाने का सही तरीका
धार्मिक परंपरा के अनुसार पीपल, बरगद और पाकड़ के पौधों को एक ही गड्ढे में या त्रिकोणाकार स्वरूप में बहुत कम दूरी पर लगाया जाता है। जैसे-जैसे वे बढ़ते हैं, उनकी शाखाएं आपस में जुड़कर एक विशाल छत्र का निर्माण कर देती हैं। इन पौधों को खुली जगह, मंदिर परिसर, खेत, तालाब किनारे, पार्क या सार्वजनिक स्थानों पर लगाना सबसे उपयुक्त माना जाता है।
