Bhaum Pradosh Vrat Katha, भौम प्रदोष व्रत कथा इन हिंदी: आज भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत का पावन दिन है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि के बाद त्रयोदशी तिथि शुरू हो रही है, इसलिए उदया तिथि के नियम के अनुसार 8 सितंबर को प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। इस बार त्रयोदशी मंगलवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जा रहा है।
टाइम्स नाऊ नवभारत पर यह भी पढ़ें - भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत की तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त
प्रदोष व्रत में भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और शाम के समय भगवान शिव की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में महादेव की आराधना करने से जीवन की परेशानियां दूर होने और सुख-समृद्धि की प्राप्ति की कामना की जाती है। पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ना भी इस दिन विशेष माना जाता है। अगर आप भी आज भौम प्रदोष का व्रत रख रहे हैं, तो पूजा से पहले जानिए इस व्रत की पौराणिक कथा और इससे जुड़ी मान्यताएं।
Bhaum Pradosh Vrat Katha, भौम प्रदोष व्रत कथा इन हिंदी
बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में एक गरीब विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसके पास आय का कोई साधन नहीं था। वह रोज भिक्षा मांगकर अपना और अपना जीवन चलाती थी। इसके बावजूद वह भगवान शिव की भक्त थी और श्रद्धा के साथ अपना जीवन बिताती थी। एक दिन भिक्षा लेकर घर लौटते समय ब्राह्मणी को रास्ते में दो छोटे बच्चे दिखाई दिए। दोनों बच्चे बेसहारा और बहुत गरीब थे। उन्हें इस हालत में देखकर ब्राह्मणी का मन पिघल गया। उसने दोनों बच्चों को अपने साथ घर ले जाने का फैसला किया। इसके बाद वह उन्हें अपने बच्चों की तरह पालने लगी और उनकी देखभाल करने लगी।
समय बीतता गया और दोनों बालक बड़े होने लगे। जब वे कुछ समझदार हुए तो ब्राह्मणी उन्हें शांडिल्य ऋषि के आश्रम में ले गई। वहां ऋषि ने अपनी तपस्या और ज्ञान के माध्यम से दोनों बच्चों के बारे में सच्चाई जानी। उन्होंने ब्राह्मणी को बताया कि ये दोनों साधारण बच्चे नहीं हैं, बल्कि विदर्भ के राजकुमार हैं। ऋषि ने बताया कि उनके पिता का राज्य एक गंधर्व राजा ने छीन लिया था। इसी कारण दोनों राजकुमारों को अपना राजमहल छोड़कर भटकना पड़ा और वे इस स्थिति में पहुंच गए।
यह बात सुनकर ब्राह्मणी ने ऋषि से पूछा कि दोनों राजकुमारों को उनका खोया हुआ राज्य और सम्मान वापस कैसे मिल सकता है। तब शांडिल्य ऋषि ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने और विधि-विधान से प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी। ब्राह्मणी और दोनों राजकुमारों ने ऋषि की बात मान ली। तीनों ने श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रदोष व्रत करना शुरू किया। वे भगवान शिव की पूजा करते और उनसे अपने जीवन की परेशानियां दूर करने की प्रार्थना करते।
इसी दौरान एक दिन बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती नाम की एक युवती से हुई। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। जब अंशुमती के पिता को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने राजकुमार की पहचान और परिस्थितियों को समझने के बाद विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी। विवाह के बाद अंशुमती के पिता ने दोनों राजकुमारों की सहायता करने का निर्णय लिया। उनकी मदद से राजकुमारों ने गंधर्व राजा के खिलाफ युद्ध किया। युद्ध में उन्हें विजय प्राप्त हुई और दोनों भाइयों को अपना खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।
राज्य मिलने के साथ ही उनके जीवन में फिर से सुख और सम्मान लौट आया। वहीं जिस ब्राह्मणी ने कठिन समय में दोनों राजकुमारों को सहारा दिया था, उसके जीवन के दुख भी धीरे-धीरे समाप्त हो गए। मान्यता है कि भगवान शिव की कृपा और प्रदोष व्रत के पुण्य से राजकुमारों को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिला और उनके जीवन में सुख-समृद्धि आई। भौम प्रदोष व्रत की यह कथा श्रद्धालुओं को विश्वास, सेवा और भगवान शिव की भक्ति का महत्व समझाती है।
