अध्यात्म

Guru Purnima Sanskrit Shlok: गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा.. यहां देखें गुरु पूर्णिमा 2025 के संस्कृत श्लोक

Guru Purnima Sanskrit Shlok Wishes Images and Guru Devo Bhava Text (गुरु पूर्णिमा श्लोक): आज गुरु पूर्णिमा का खास त्योहार है। इस मौके पर समस्त गुरुओं को नमन करने के लिए कुछ खास संस्कृत के श्लोक समर्पित हैं। यहां से आप गुरु पूर्णिमा 2025 के प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक देख सकते हैं।

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guru purnima 2025 sanskrit shloka (Photo Source: Times Now Navbharat)

Guru Purnima Sanskrit Shlok (गुरु पूर्णिमा श्लोक): गुरु पूर्णिमा का दिन बेहद खास होता है। सनातन धर्म में गुरुओं का स्थान सबसे ऊंचा माना जाता है। ये दिन हमारे जीवन में गुरु के महत्व को दिखाता है। कहते हैं इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म भी हुआ था। संस्कृत साहित्य में गुरुओं के सम्मान के कई श्लोक लिए गए हैं। यहां से आप उन श्लोक को पढ़ सकते हैं।

Guru Purnima Ke Shlok-

1) देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।

अर्थ- देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्चर्य और अहिंसा-ये शरीर संबंधी तप कहलाते हैं। जो मनुष्य ज्ञान दे और ब्रह्म की ओर ले जाए उसे गुरु कहते हैं।

2) गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु

गुरु देवो महेश्वरा

गुरु साक्षात परम ब्रह्मा

तस्मै श्री गुरुवे नमः

अर्थ- गुरु देव तुल्य होते हैं, देवता के समान होते हैं।

3) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यिा माम शुचः ।।

अर्थ- सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे। शोक नहीं करना चाहिए।

Guru Purnima Ke Dohe-

4) बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।

महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।

अर्थ- गुरु मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूं। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है,वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।

5) स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च ।

गुरु वृत्युनुरोधेन न किंचितदपि दुर्लभम् ।।

अर्थ- गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग,धन-धान्य,विद्या,पुत्र,सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

Guru Purnima Quotes In Sanskrit-

6) गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।

जों बिरंचि संकर सम होई।।

अर्थ- भले ही कोई ब्रह्मा, शंकर के समान क्यों न हो, वह गुरु के बिना भव सागर पार नहीं कर सकता।

7) गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।।

अर्थ- गुरु और गोविन्द एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए –गुरु को अथवा गोविन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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