Gangaur Puja Katha (गणगौर पूजा कथा): गणगौर पूजा का त्योहार महिलाओं के लिए बेहद खास होता है। कहते हैं जो महिला सच्चे मन से इस दिन व्रत रखकर शिव-पार्वती की विधि विधान पूजा करती है उसके सुहाग को लंबी आयु की प्राप्ति होती है। साथ ही उसके वैवाहिक जीवन में भी सदैव खुशियां बनी रहती हैं। ये पर्व मुख्य रूप से राजस्थान की महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस पर्व की कहानी भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है। चलिए जानते हैं गणगौर की पौराणिक कथा जो व्रत रखने वाली महिलाओं को जरूर पढ़नी चाहिए।
Gangaur Puja Katha (गणगौर पूजा कथा)
गणगौर की पौराणिक कथा अनुसार, एक समय की बात है, भगवान शंकर, माता पार्वती और नारदजी के साथ भ्रमण हेतु चल दिए। वे चलते-चलते चैत्र शुक्ल तृतीया को एक गांव में जा पहुंचे। उनका आगमन सुनकर ग्राम की गरीब महिलाएं उनके स्वागत के लिए थालियों में हल्दी एवं अक्षत लेकर पूजन के लिए पहुंचीं। पार्वती जी ने निर्धन महिलाओं की श्रद्धा भाव को समझकर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। इस तरह से गरीब महिलाएं अटल सुहाग प्राप्त कर लौटीं। इसके बाद धनी वर्ग की महिलाएं अनेक प्रकार के पकवान सोने-चांदी के थालो में सजाकर पहुंची।
इन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने माता पार्वती से कहा तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया। अब ऐस इन्हें क्या दोगी? पार्वतीजी बोलीं: प्राणनाथ! उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थो से बना रस दिया गया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परन्तु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी उंगली से चीरकर रक्त का सुहाग रस दूंगी जिससे वो मेरे समान सौभाग्यवती हो जाएंगी।
जब धन स्त्रियों ने पूजन समाप्त किया तब पार्वती जी ने अपनी उंगली चीरकर उस रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया। इसके बाद पार्वती जी अपने पति भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गईं। स्नान के बाद माता ने बालू की शिवजी मूर्ति बनाकर पूजन किया। साथ में भोग लगाया तथा प्रदक्षिणा करके दो कणों का प्रसाद खाकर मस्तक पर टीका लगाया। कहते हैं उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को वरदान दिय कि आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी उसके पति को लंबी आयु की प्राप्ति होगी।
पूजा करते-करते पार्वती जी को काफी समय लग गया। पार्वतीजी जब नदी के तट से चलकर उस स्थान पर आई जहां पर भगवान शंकर व नारदजी को छोड़कर गई थीं तब शिवजी ने विलम्ब से आने का कारण पूछा तो पार्वती जी बोली, मेरे भाई-भावज नदी किनारे मिल गए थे। उन्होने मुझसे दूध भात खाने और ठहरने का आग्रह किया। इसी कारण से देर हो गई।
ये जानकर भगवान शंकर भी दूध भात खाने के लालच में नदी तट की ओर चल दिए। पार्वतीजी ने मौन भाव से भगवान शिवजी का ही ध्यान करके प्रार्थना की, भगवान आप अपनी इस अनन्य दासी की लाज रखिएगा। ऐसी प्रार्थना करती हुई माता पार्वती जी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलने लगी। जब वे नदी तट पर पहुंची तो उन्हें माया का महल दिखाई दिया। महल के अन्दर शिवजी के साले तथा सहलज ने शिव पार्वती का स्वागत किया।
माता पार्वती और शिव जी वहां दो दिन रहे, तीसरे दिन पार्वती जी ने शिवजी से चलने के लिए कहा तो भगवान शिव चलने को तैयार नहीं हुए। तब पार्वती जी रूठकर अकेली ही चल दी। ऐसी स्थिति में भगवान शिव को भी पार्वती के साथ चलना पड़ा। साथ में नारदजी भी चल दिए। चलते-चलते भगवान शंकर बोले, मैं तुम्हारे मायके में अपनी एक माला भूल आया। माला लाने के लिए भगवान शंकर ने नारद जी को भेजा ।
वहां पहुंचने पर नारद जी को कोई महल नजर नहीं आया। सहसा बिजली कौंधी, नारदजी को शिवजी की माला एक पेड पर टंगी दिखाई दी। नारदजी माला लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे और उन्हें सबकुछ बता दिया कि वहां कोई महल नहीं मिला। शिवजी हंसकर कहने लगे: यह सब पार्वती की ही लीला हैं। इस पर पार्वती जी बोलीं: मैं किस योग्य हूं। यह सब तो आपकी ही कृपा है।
भगवान शिव और माता पार्वती की लीला को देख नारद जी बोले, आपके पतिव्रत के प्रभाव से ही यह लीला हुयी है। सांसारिक स्त्रियों को आपके केवल स्मरण मात्र से ही अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। नारद जी कहते हैं कि हे माता! गुप्त पूजन साधारण पूजन से भी ज्यादा फलदायी होता है। अतः मैं यह आशीष प्रदान करता हूं कि जो भी स्त्रियां चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन गुप्त रूप से आपकी पूजा अर्चना करेंगी उनके पति को दीर्घायु की प्राप्ति होगी।
