अध्यात्म

Sankashti Chaturthi Vrat Katha: गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, पढ़ें मार्गशीर्ष संकष्टी चतुर्थी की कहानी

Ganadhipa Sankashti Chaturthi Vrat Katha (गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी मनाया जाता है। ये खास दिन आज यानी 8 नवंबर को है। आज के दिन संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा जरूर पढ़ी जाती है। इस व्रत कथा को आप यहां से देख सकते हैं।

गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (pic credit: canva)

Ganadhipa Sankashti ChaturthiVrat Katha (गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): त्रेतायुग में दशरथ नामक एक प्रतापी राजा थे। उन्हें शिकार करना बेहद अच्छा लगता था। एक बार अनजाने में उनसें एक श्रवणकुमार नामक ब्राह्मण का वध हो गया। उस ब्राह्मण के अंधे मां-बाप ने राजा दशरथ को शाप दिया कि जिस प्रकार हम लोग पुत्रशोक में मर रहे हैं, उसी तरह तुम्हारी भी पुत्रशोक में मृत्यु होगी। इससे राजा बहुत परेशान हो गए। उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। फलस्वरूप जगदीश्वर ने राम रूप में उनके यहां अवतार लिया। वहीं भगवती लक्ष्मी जानकी के रूप में अवतरित हुईं।

पिता की आज्ञा पाकर भगवान राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण वन को गए जहां उन्होंने खर-दूषण आदि अनेक राक्षसों का वध किया। इससे क्रोधित होकर रावण ने सीताजी का अपहरण कर लिया। फिर सीता की खोज में भगवान राम ने पंचवटी का त्याग किया और ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचकर सुग्रीव से मैत्री की। इसके बाद सीता जी की खोज में हनुमान आदि वानर तत्पर हुए। उन्हें ढूंढते-ढूंढते गिद्धराज संपाती को देखा। वानरों को देखकर संपाती ने उनकी पहचान पूछी कहा कि तुम कौन हो? इस वन में कैसे आये हो? किसने तुम्हें भेजा है?

संपाती की बात सुनकर वानरों ने उत्तर दिया कि दशरथ नंदन रामजी, सीता और लक्ष्मण जी के साथ दंडकवन में आए हैं। जहां पर उनकी पत्नी सीताजी का अपरहण हो गया है। हे मित्र! इस बात को हम लोग नहीं जानते कि सीता कहां हैं?

संपाती ने कहा कि तुम सब रामचंद्र के सेवक होने के नाते हमारे मित्र हो। सीता जी का जिसने हरण किया है वह मुझे मालूम है। सीता जी को बचाने के लिए मेरा छोटा भाई जटायु अपने प्राण गंवा चुका है। यहां से थोड़ी ही दूर पर ही समुद्र है और समुद्र के उस पार राक्षस नगरी है। वहीं अशोक के पेड़ के नीचे सीता जी बैठी हैं। सीता जी अभी भी मुझे दिखाई दे रही हैं। सभी वानरों में हनुमान जी अत्यंत पराक्रमशाली है। अतः उन्हें वहां जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ हनुमान जी ही अपने पराक्रम से इस विशाल समुद्र को लांघ सकते हैं।

संपाती की बात सुनकर हनुमान जी ने पूछा हे संपाती! इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पार कर सकता हूं? जब हमारे सब वानर उसे पार करने में असमर्थ हैं तो मैं ही अकेला कैसे पार जा सकता हूं?

संपाति ने हनुमान जी को उत्तर दिया कि हे मित्र, आप संकटनाशक गणेश चतुर्थी का व्रत करो। उस व्रत के प्रभाव से आप समुद्र को क्षणभर में पार कर लोगे। संपाती के आदेश पर ही हनुमान भगवान ने संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को किया। इसके प्रभाव से हनुमान जी क्षणभर में ही समुद्र को लांघ गए। अत: इस लोक में इसके सामान सुखदायक कोई दूसरा व्रत नहीं हैं।

श्रीकृष्ण भगवान महाराज युधिष्ठर से कहते हैं कि आप भी इस व्रत को कीजिए। इस व्रत के प्रभाव से आप अपने शत्रुओं को जीतकर सम्पूर्ण राज्य के अधिकारी बन जाएंगे। भगवान कृष्ण का वचन सुनकर युधिष्ठर ने भी इस गणेश चतुर्थी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें अपने शत्रुओं पर जीत मिलगी और वे राज्य के अधिकारी बन गए।

लेटेस्ट न्यूज

Srishti
Srishti Author

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्... और देखें

End of Article