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Ekdant Sankashti Vrat Katha: यहां पढ़ें एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, जानें दयादेव ब्राह्मण की जेठ कृष्ण संकष्टी चतुर्थी की कहानी

Ekdant Sankashti Vrat Katha: पढ़ें जेठ कृष्ण पक्ष की एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा और जानें दयादेव ब्राह्मण की पौराणिक कहानी, पूजा विधि व महत्व। जानें एकदंत संकष्टी चतुर्थी की कहानी क्या है।

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एकदन्त संकष्टी व्रत कथा हिंदी में

Ekdant Sankashti Vrat Katha: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत बड़े श्रद्धा भाव से किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप को समर्पित है, जो विघ्नों को हरने वाले माने जाते हैं। इस दिन व्रत रखकर कथा सुनने और विधिपूर्वक पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। दयादेव ब्राह्मण की कथा इस व्रत की महिमा को और भी प्रभावी ढंग से दर्शाती है। जेठ कृष्ण पक्ष की एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा। जानें जेठ संकष्टी चतुर्थी की दयादेव ब्राह्मण की कहानी क्या है।

एकदन्त संकष्टी व्रत कथा (दयादेव नामक ब्राह्मण की कथा)

संकष्टी चतुर्थी के व्रतों का महत्त्व बताते हुए एक बार माता पार्वती ने भगवान गणेश से प्रश्न किया - हे पुत्र! ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी के दिन किस प्रकार आपका पूजन करना चाहिए? इस दिन आपका कौन सा स्वरूप पूजित होता है और व्रत में क्या आहार ग्रहण करना उचित है? कृपया विस्तार से बताइए।

भगवान गणेश मुस्कुराते हुए बोले- हे माता! ज्येष्ठ मास की कृष्ण चतुर्थी अत्यंत पुण्यदायिनी है। इस दिन मेरे 'एकदन्त' स्वरूप की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से सौभाग्य, सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। भक्तों को इस व्रत में शुद्ध घी से बने लड्डू, हलवा, पूड़ी आदि का भोग अर्पित करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। अब मैं आपको इस व्रत से जुड़ी एक प्राचीन कथा सुनाता हूं।

धर्मात्मा राजा और विद्वान ब्राह्मण

सतयुग में पृथु नामक एक न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थे। उनके राज्य में दयादेव नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे, जो वेदों के ज्ञाता और धर्म के प्रति समर्पित थे। उनके चार पुत्र थे, और सभी अपने पिता की तरह ज्ञानवान और संस्कारी थे। समय आने पर दयादेव ने अपने चारों पुत्रों का विवाह पूरे वैदिक विधि-विधान से कर दिया। घर में खुशहाली और समृद्धि का वातावरण था।

ज्येष्ठ बहू की आस्था

विवाह के कुछ समय बाद, एक दिन दयादेव की ज्येष्ठ पुत्रवधू ने अपनी सास से विनम्रता से कहा - हे माता! मैं बचपन से ही गणेश संकष्टी चतुर्थी का व्रत करती आई हूं। यह व्रत मेरे लिए अत्यंत प्रिय है। कृपया मुझे यहां भी इसे करने की अनुमति दें। उसकी सास तो मौन रहीं, लेकिन यह बात जब दयादेव ने सुनी, तो उन्होंने कुछ कठोर शब्द कहे - हे पुत्री! तुम घर की बड़ी बहू हो, तुम्हारे जीवन में कोई कष्ट भी नहीं है। तुम्हारी उम्र आनंद लेने की है, फिर तुम इस व्रत में क्यों पड़ना चाहती हो? और यह गणेश कौन हैं जिनके लिए तुम इतनी उत्सुक हो?

बहू ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने मन ही मन अपनी श्रद्धा बनाए रखी और चुपचाप व्रत करती रही।

व्रत का फल और उसका त्याग

कुछ समय बाद वह बहू गर्भवती हुई और समय आने पर उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। घर में खुशियां फैल गईं। लेकिन उसकी सास को उसका व्रत करना पसंद नहीं था। वह बार-बार उसे व्रत छोड़ने के लिए कहती रही। आखिरकार, सास के दबाव में आकर बहू ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत त्याग दिया। इससे भगवान गणेश अप्रसन्न हो गए।

विवाह के दिन गायब हुआ पुत्र

समय बीता, और वह बालक बड़ा होकर विवाह योग्य हुआ। जब उसका विवाह तय हुआ और विवाह का शुभ दिन आया, तभी अचानक वह युवक रहस्यमय तरीके से गायब हो गया। पूरे विवाह मंडप में हाहाकार मच गया। सभी लोग हैरान थे कि आखिर दूल्हा कहां चला गया। जब यह खबर उसकी मां (ज्येष्ठ बहू) को मिली, तो वह रोते हुए अपने ससुर से बोली - यह सब मेरे व्रत छोड़ने का परिणाम है। आपने और माता जी ने मुझे व्रत त्यागने को मजबूर किया, इसलिए आज मेरा पुत्र मुझसे छिन गया। दयादेव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उनका हृदय दुख से भर गया।

बहू की पुत्रवधू की भक्ति

उधर उस युवक की पत्नी (नई बहू) ने यह सब सुना और अपने पति की कुशलता के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया कि वह हर महीने श्रद्धा से संकष्टी चतुर्थी का व्रत करेगी। वह पूरी निष्ठा और भक्ति के साथ व्रत करने लगी।

भगवान गणेश का आशीर्वाद

एक दिन एक दुर्बल ब्राह्मण भिक्षा मांगते हुए उसके द्वार पर आया। उसने पूरे आदर से ब्राह्मण को बैठाया, भोजन कराया, वस्त्र और दक्षिणा दी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर वह ब्राह्मण बोला - हे पुत्री! मैं तुम्हारी सेवा और श्रद्धा से अत्यंत प्रसन्न हूं। वर मांगो। तब उसने अपना असली रूप प्रकट किया - वह स्वयं भगवान गणेश थे।

कन्या ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की - हे विघ्नहर्ता! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे मेरे पति का सानिध्य प्रदान करें। भगवान गणेश ने कहा- तथास्तु! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। और वे अंतर्धान हो गए।

खोया हुआ पुत्र वापस मिला

कुछ समय बाद एक ब्राह्मण को वन में वही युवक मिला और वह उसे वापस नगर ले आया। नगर में खुशी की लहर दौड़ गई। दयादेव और उनका परिवार अपने पुत्र को सकुशल देखकर भावुक हो उठे। ज्येष्ठ बहू ने समझ लिया कि यह सब भगवान गणेश की कृपा है। दयादेव ने उस ब्राह्मण का सम्मान किया, उसे भोजन कराया, वस्त्र और दान देकर कृतज्ञता प्रकट की। इसके बाद पुनः शुभ मुहूर्त में विवाह संस्कार सम्पन्न कराया गया।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत का संदेश

भगवान गणेश ने अंत में बताया- जो भी व्यक्ति ज्येष्ठ मास की कृष्ण चतुर्थी को श्रद्धा और विधि-विधान से मेरा व्रत करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि इस व्रत का पालन करने से शत्रुओं पर विजय और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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