Shattila Ekadashi Date Live: आज की एकादशी की कहानी क्या है, आज के एकादशी व्रत का पारण कब है, एकादशी को चावल खाने से क्या होता है
Aaj Ki Ekadashi ka Paran Kab Karein, Aaj ki Ekadashi ki Katha, Kya Aaj Chawal Kha Sakte hain, Shattila Akadashi Vrat katha Puja Vidhi, Aarti Live Updates: जनवरी महीने में एकादशी के दो व्रत आएंगे। 14 जनवरी 2026 को साल की पहली एकादशी कब है। वहीं दूसरी एकादशी का व्रत महीने के अंत में रखा जाएगा। यहां आप जनवरी के एकादशी व्रत की जानकारी विस्तार से ले सकते हैं। देखें कि आज कौन सी एकादशी है। आज 14 जनवरी को कौन सी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। देखें आज षटतिला एकादशी है क्या। आज की एकादशी के व्रत नियम और लाभ। साथ ही जानें कि एकादशी व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए। क्या एकादशी व्रत में चावल खा सकते हैं। क्या एकादशी व्रत में बाल धो सकते हैं। साथ ही पढ़ें आज की एकादशी की व्रत कथा। जानें आज की एकादशी का पारण कब करना है। , आज का पंचांग 14 January 2026:आज षटतिला एकादशी पर दो शुभ योगों का संयोग
Shattila Ekadashi Date Live: आज की एकादशी की कहानी क्या है, आज के एकादशी व्रत का पारण कब है, एकादशी को चावल खाने से क्या होता है
जनवरी 2026 की दूसरी एकादशी कब है, देखें अगली एकादशी कब पड़ेगी
Ekadashi ke Bhajan Likhe hue Lyrics
षटतिला एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी जो भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी। वह जीवनभर भगवान विष्णु के सभी व्रत पूरे नियम और श्रद्धा से करती थी।
ब्राह्मणी ने कौन-सा कठिन व्रत किया था?
एक बार उस ब्राह्मणी ने भगवान विष्णु की आराधना करते हुए पूरे एक महीने तक उपवास रखा। इस लंबे उपवास से उसका शरीर कमजोर हो गया, लेकिन उसका तन पूरी तरह शुद्ध हो गया।
भगवान विष्णु को क्या चिंता हुई?
भगवान विष्णु ने अपने भक्त की सच्ची भक्ति देखकर सोचा कि तन की शुद्धि से तो इसे बैकुंठ की प्राप्ति हो जाएगी, लेकिन इसका मन तृप्त नहीं हो पाएगा।
क्योंकि उस ब्राह्मणी ने व्रत तो किया, लेकिन कभी अन्न या धन का दान नहीं किया था। शास्त्रों के अनुसार बिना दान के व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।
भगवान विष्णु ब्राह्मणी के घर क्यों गए?
अपने भक्त को सही मार्ग दिखाने के लिए भगवान विष्णु स्वयं भिक्षा मांगने ब्राह्मणी के घर पहुंचे। लेकिन ब्राह्मणी ने दान में उन्हें केवल मिट्टी का एक पिंड दे दिया। भगवान विष्णु उसे स्वीकार कर वहां से लौट गए।
ब्राह्मणी को विष्णुलोक में क्या मिला?
कुछ समय बाद ब्राह्मणी का देहांत हो गया और वह विष्णुलोक पहुंची। वहां उसे रहने के लिए सिर्फ एक छोटी सी कुटिया मिली, जिसमें केवल एक आम का पेड़ था।
यह देखकर ब्राह्मणी ने प्रश्न किया कि इतने व्रत करने के बाद भी उसे यह साधारण स्थान क्यों मिला?
भगवान विष्णु ने क्या उत्तर दिया?
भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने मनुष्य जीवन में कभी अन्न या धन का दान नहीं किया, इसलिए तुम्हें व्रत का पूरा फल नहीं मिला। यह सुनकर ब्राह्मणी को गहरा पश्चाताप हुआ।
षटतिला एकादशी व्रत का उपाय क्या बताया गया?
ब्राह्मणी ने भगवान से उपाय पूछा। तब भगवान विष्णु ने कहा कि जब देव कन्याएं तुमसे मिलने आएं, तो उनसे षटतिला एकादशी व्रत की पूरी विधि पूछना। जब तक वे विधि न बता दें, तब तक कुटिया का द्वार मत खोलना।
षटतिला एकादशी व्रत का फल क्या मिला?
ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया और विधि जानकर षटतिला एकादशी का व्रत किया।
इस व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया धन-धान्य, सुख-सुविधाओं से भर गई और उसका जीवन आनंदमय हो गया।
षटतिला एकादशी का महत्व क्या है?
इस कथा के माध्यम से बताया गया है कि षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करने से सौभाग्य बढ़ता है, दरिद्रता दूर होती है और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल में जल तत्व अधिक होता है और उसमें नकारात्मक ऊर्जा मानी जाती है, इसलिए इसका सेवन वर्जित है। आयुर्वेदिक दृष्टि से एकादशी पर पाचन शक्ति कमजोर रहती है, और चावल भारी होने के कारण व्रत में नहीं खाए जाते।
आज की एकादशी का पारण कब करें
एकादशी व्रत का पारण व्रत से अगले दिन किया जाता है। पारण समय अगले दिन सूर्योदय के बाद एक से दो घंटे के बीच का होता है। साथ ही एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में ही हो जाना चाहिए। षटतिला एकादशी 2026 का पारण समय 15 जनवरी को सुबह 7:15 के बाद रहेगा जब सूर्य देव दर्शन देंगे। व्रत का पारण विष्णु जी की पूजा, दान की सामग्री निकालने और प्रसाद ग्रहण करने से करें।
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Shattila Ekadashi Date Live: एकादशी को चावल खाने से क्या होता है?
Shattila Ekadashi Date Live: जनवरी 2026 में कितनी एकादशी हैं
1. षटतिला एकादशी – 15 जनवरी 2026
2. दूसरी एकादशी – 30 जनवरी 2026
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मंत्र जप तुलसी दल और दीपक के साथ करें। काले तिल का प्रयोग अधिक शुभ माना जाता है।
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ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
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क्या है धर्मराज की कहानी, जिसे सुनने से खुलते हैं स्वर्ग के द्वार
भगवान विष्णु के कल्कि अवतार की कहानी
बुढ़िया फिर से आगे बढ़ने लगी तब उसके रास्ते में कौए आ गए और उन्होंने उसके सिर में चोंच मारनी शुरु कर दी तो यमदूत बोले कि किसी ब्राह्मण की बेटी के सिर में तेल लगाया था या नहीं? बुढ़िया ने फिर ब्राह्मण की बेटी का ध्यान किया तो कौए वापस चले गए। कुछ आगे बढ़ने पर बुढ़िया के पैर में कांटे चुभने शुरू हो गए यमदूत बोले कि खड़ाऊ का दान किया है या नहीं? बुढ़िया ने उनका ध्यान किया तो खड़ाऊ उसके पैरों में आ गई। बुढ़िया फिर आगे बढ़ी तो फिर चित्रगुप्त जी ने यमराज से कहा कि आप यहां किसे लेकर आए हो?
तब यमराज जी बोले कि बुढ़िया ने दान-पुण्य तो बहुत किए हैं लेकिन उन्होंने अपने जीवन में धर्मराज जी के लिए कुछ नहीं किया इसलिए आगे के द्वार इसके लिए बंद हैं। धर्मराज की सारी बात सुनने के बाद बुढ़िया बोली कि आप मुझे सिर्फ सात दिन के लिए धरती पर वापस भेज दें। मैं पूरी श्रद्धा से धर्मराज जी का व्रत और उद्यापन करके वापस यहां लौट आऊंगी। यमराज ने उन्हें धरती पर वापस भेज दिया।
बुढ़िया अपने गांव आ गई और गांव वालों ने उसे भूतनी समझकर अपने घर के दरवाजे बंद कर दिए। वह जब अपने घर गई तो उसके बहू-बेटे ने भी डर के मारे दरवाजे बंद कर दिये। बुढ़िया ने कहा कि मैं भूतनी नहीं हूं, मैं तो धर्मराज जी की आज्ञा से सिर्फ 7 दिन के लिए धरती पर वापस आई हूं। इन सातों दिनों में मैं धर्मराज जी का व्रत और उद्यापन करुंगी जिससे मेरे लिए परलोक के रास्ते खुल जाएंगे।
बुढ़िया की बातें सुनकर बहू-बेटे उसके लिए पूजा की सामग्री ले आए। लेकिन जब बुढ़िया कहानी कहती है तब वह हुंकारा नहीं भरत। जिससे बुढ़िया बाद में अपनी पड़ोसन को कहानी सुनाती है और वह हुंकारा भरती है। इस तरह से सात दिन धर्मराज की विधि विधान व्रत पूजा और उद्यापन करने के बाद धर्मराज जी बुढ़िया को लेने के लिए विमान भेजते हैं।
स्वर्ग से आए विमान को देख उसके बहू-बेटों के साथ सारे गांववाले भी स्वर्ग जाने को तैयार हो गए। बुढ़िया ने कहा कि तुम कहां तैयार हो रहे हो? मेरी कहानी तो सिर्फ मेरी पड़ोसन ने सुनी है इसलिए वही मेरे साथ जाएगी। तब सारे गांववाले बुढ़िया से धर्मराज जी की कहानी सुनाने का आग्रह करने लगे तब बुढ़िया उन्हें भी कहानी सुना देती है। कहानी सुनने के बाद गांव के सभी लोग विमान में बैठकर स्वर्ग जाते हैं तो धर्मराज जी कहते हैं मैने तो विमान केवल बुढ़िया को लाने के लिए भेजा था। तब बुढ़िया माई ने कहा कि हे धर्मराज जी! मैने अपने जीवन में जो भी पुण्य किए हैं उसमें से आधा भाग मैं आप गांववालों को देना चाहती हूं इस तरह से धर्मराज ने ग्रामवासियों को भी स्वर्ग में जाने दिया।
हे धर्मराज महाराज! जैसे आपने बुढ़िया और उसके गांव के सभी लोगों को स्वर्ग में जगह दी उसी तरह से हमें भी देना। साथ ही कहानी सुनकर हुंकारा भरने वालों को भी और कहानी कहने वाले को भी परलोक में जगह देना। धर्मराज महाराज जी की जय! यमराज महाराज जी की जय!
धर्मराज की कहानी पढ़ने के नियम (Dharmraj Ki Kahani Ke Niyam)
पौराणिक कथाओं अनुसार कोई एक साल, कोई 6 महीने, कोई सात दिन ही सुने पर धर्मराज जी की कहानी जरूर सुननी चाहिए। इसके बाद उसका उद्यापन कर देना चाहिए। उद्यापन में काठी, छतरी, टोकरी, टोर्च, साड़ी ब्लाउज का बेस, चप्पल, बाल्टी रस्सी, छ: मोती, छ: मूंगा, यमराज जी की लोहे की मूर्ति, लोटे में शक्कर भरकर, पांच बर्तन, धर्मराज जी की सोने की मूर्ति, चांदी का चांद, सोने का सूरज, चांदी का साठिया ब्राह्मण को दान में देना चाहिए। ध्यान रखें कि प्रतिदिन चावल का साठिया बनाकर ही ये कहानी सुनी जाती है।
