Dashama Vrat Katha: दशमा व्रत की शुरुआत गुजराती कैलेंडर के अनुसार श्रावण शुक्ल पक्ष के पहले दिन से होती है और फिर लगातार 10 दिनों तक ये पर्व मनाया जाता है। इस दौरान दशमा का आशीर्वाद पाने के लिए विभिन्न तरह के अनुष्ठान किए जाते हैं। कहते हैं इस व्रत पूजन को करने से घर-परिवार में सदैव सुख-समृद्धि बनी रहती है। दशमा माता को मोमई मां के नाम से भी जाना जाता है। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं दशामा की व्रत कथा और पूजा विधि।
दशामा व्रत कथा (Dashama Vrat Katha)
दशामाता की व्रत कथा राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती से जुड़ी है। उन दोनों के दो पुत्र थे। उनके राज्य की प्रजा बेहद सुख से रह रही थी। एक दिन होली दसा थी। उस दिन एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा कि दशा का डोरा ले लो। उस समय वहां मौजूद दासी बोली हां रानी साहिबा, आज के दिन सुहागिन स्त्रियां दशा माता का व्रत रखती हैं और इस डोरे को गले में बांधती हैं। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसके बाद रानी ने डोरा ले लिया और विधि अनुसार उसे गले में पहन लिया। पूरी कथा सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।
दशामा व्रत कथा गुजराती (Dashama Vrat Katha Gujrati)
दशामा व्रत पूजा विधि (Dashama Vrat Vidhi)
दशामा पूजन के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। इसके बाद पूजा का संकल्प लें। फिर पीपल के पेड़ की पूजा करें। इस दिन कच्चे सूत में 10 गांठ लगाकर उसकी भी पूजा करें। इसके बाद उसे अपने गले में बांध लं। फिर पीपल के पेड़ की 10 परिक्रमा करें। इसके बाद दीपक जलाएं। साथ में चावल, कुमकुम, गुलाल अर्पित करें। इस व्रत वाले दिन एक ही बार बिना नमक के भोजन का सेवन करें। इसके बाद महिलाएं दशा माता से घर की दशा सुधारने की प्रार्थना करती हैं। दशामा की पूजा के अंत में व्रत कथा करें और फिर आरती करें।
