Chaitra Navratri Vrat Katha (चैत्र नवरात्रि व्रत कथा): चैत्र नवरात्रि की पौराणिक कथा अनुसार ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर दैत्यराज महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग तक कर लिया था। दानवों के बढ़ते दुराचार की वजह से देवी-देवता भी परेशान हो गए थे। एक समय ऐसा भी आया जब महिषासुर और उसकी सेना ने देवताओं के राजा इंद्र की सेना पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और देवराज इंद्र के सिंहासन पर अपना हक जमा लिया था।
महिषासुर के इस दुस्साहस के कारण भगवान शंकर और भगवान विष्णु को क्रोध आ गया और तब महिषासुर का अंत करने के लिए देवी शक्ति के जन्म पर विचार किया गया। सभी सभी देवी-देवताओं ने महिषासुर का वध करने के लिए अपने तेज से एक अत्यंत ही ताकतवर देवी को उत्पन्न किया।
सभी देवी-देवताओं ने अपने शस्त्र देवी को समर्पित किए और देवी महिषासुर का वध करने के लिए चल दीं। देवी के भव्य स्वरूप को देखकर महिषासुर भयभीत हो गया था। महिषासुर ने देवी को परास्त करने के लिए अपनी सेना भेजी लेकिन देवी ने महिषासुर द्वारा भेजे गए सभी असुरों का अंत कर दिया। इसके बाद महिषासुर खुद युद्ध भूमि में आया। देवी और महिषासुर की लड़ाई नौ दिन तक चली और आखिर में महिषासुर मारा गया। माता ने महिषासुर का वध नवरात्रि के नौवें दिन किया। कहते हैं इसलिए ही चैत्र नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।
चैत्र नवरात्रि की आरती-
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,
तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती।
तेरे भक्त जनो पर माता भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो मां करके सिंह सवारी॥
सौ-सौ सिहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली,
दुष्टों को तू ही ललकारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
माँ-बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता॥
सब पे करूणा दर्शाने वाली, अमृत बरसाने वाली,
दुखियों के दुखड़े निवारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना।
हम तो मांगें तेरे चरणों में छोटा सा कोना॥
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,
सतियों के सत को संवारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली।
वरद हस्त सर पर रख दो माँ संकट हरने वाली॥
माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली,
भक्तों के कारज तू ही सारती।
ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती॥
