Bhalchandra Sankashti Vrat Katha (आज के संकष्टी व्रत की कथा), मार्च के संकष्टी व्रत की कथा: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे ही होती है। हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित होती है, लेकिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पड़ने वाली भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भक्त पूरे श्रद्धा भाव से भगवान गणेश का व्रत रखते हैं, उनकी पूजा करते हैं और व्रत कथा सुनते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन के कष्ट, बाधाएं और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
इस चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथा भगवान शिव, माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश तथा कार्तिकेय से संबंधित है, जो हमें बुद्धि, श्रद्धा और माता-पिता के सम्मान का संदेश देती है।
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार एक समय देवताओं पर भयंकर संकट आ पड़ा। असुरों के अत्याचार से वे परेशान हो गए और सहायता की उम्मीद में भगवान शिव के पास पहुंचे। देवताओं ने शिवजी से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने सोचा कि इस संकट से निपटने के लिए किसी योग्य को भेजा जाए। शिवजी ने अपने दोनों पुत्रों – गणेश और कार्तिकेय – को बुलाया और उनसे पूछा कि देवताओं की सहायता के लिए कौन जाएगा। दोनों ही देवताओं की मदद करने के लिए तैयार हो गए। तब शिवजी ने उनके बीच एक परीक्षा लेने का निर्णय किया।
भगवान शिव ने कहा कि जो भी पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, वही देवताओं की सहायता करने जाएगा। यह सुनते ही कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। दूसरी ओर भगवान गणेश के सामने एक कठिनाई थी। उनका वाहन मूषक यानी चूहा था, जिसके साथ पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करना आसान नहीं था। कुछ समय तक विचार करने के बाद गणेशजी ने अपनी बुद्धि से एक अनोखा उपाय खोज निकाला।
गणेशजी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती के सामने हाथ जोड़कर उनकी सात बार परिक्रमा की और शांत होकर बैठ गए। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने पृथ्वी की परिक्रमा क्यों नहीं की, तब गणेशजी ने विनम्रता से कहा कि माता-पिता के चरणों में ही पूरा संसार बसता है। इसलिए उनकी परिक्रमा करना ही पूरे पृथ्वी लोक की परिक्रमा के समान है।
गणेशजी की यह बात सुनकर भगवान शिव और माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेशजी की बुद्धि, भक्ति और माता-पिता के प्रति सम्मान को देखकर उन्हें ही इस परीक्षा का विजेता घोषित किया।
भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जो भी भक्त चतुर्थी के दिन श्रद्धा से उनका व्रत करेगा, पूजा करेगा और इस कथा को सुनेगा, उसके सभी संकट दूर हो जाएंगे। तभी से संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना जाता है और भगवान गणेश को संकटों का नाश करने वाला कहा जाता है।
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने, सुख-समृद्धि पाने और आर्थिक परेशानियों से मुक्ति के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है।
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि
इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करते हैं। उन्हें दूर्वा, मोदक और लड्डू अर्पित किए जाते हैं। दिनभर व्रत रखा जाता है और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है। पूजा के अंत में भगवान गणेश की आरती करना बेहद जरूरी माना गया है, क्योंकि बिना आरती के यह पूजा अधूरी मानी जाती है। भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी हमें यह भी सिखाती है कि बुद्धि, श्रद्धा और माता-पिता के सम्मान से ही जीवन में सच्ची सफलता प्राप्त होती है।
