Eid Kab Hai 2025: ईद-उल-अजहा का अर्थ है “बलिदान की ईद”। यह त्योहार पैगंबर इब्राहीम की अल्लाह के प्रति निष्ठा और आज्ञापालन की याद में मनाया जाता है। मुस्लिम धार्मिक मान्यताओं अनुसार यह त्योहार हमें सिखाता है कि अल्लाह के प्रति पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ कैसे जीवन जिया जाए और जब जीवन में बड़ी परीक्षा आए, तो समर्पण और आस्था से कैसे उसका सामना किया जाए। अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस साल बकरीद कब मनाई जाएगी और इस त्योहार को मनाने के पीछे की कहानी क्या है। चलिए इस बारे में विस्तार से जानते हैं यहां।
बकरीद कब मनाई जाती है (Bakra Kab Hot Hai)
बकरीद हर साल इस्लामी महीने धुल-हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। इस त्यौहार की तारीख इस्लामी पंचांग (हिजरी कैलेंडर) के अनुसार निर्धारित होती है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर (सामान्य कैलेंडर) की तरह स्थिर नहीं होता, इसलिए हर साल इसकी तारीख बदलती रहती है।
2025 में बकरीद कब है (Eid Ul Adha 2025 Date)
भारत में इस साल ईद का त्योहार 7 जून 2025 को मनाए जाने की पूरी उम्मीद है क्योंकि यहां धुल-हिज्जा महीने का चांद 28 मई 2025 को देखा जाएगा। लेकिन अगर चांद 28 को नहीं दिखता है तब ये त्योहार 8 जून 2025 को मनाया जाएगा।
बकरीद क्यों मनाते हैं (Bakra Eid Kyu Manate Hai)
बकरीद पर्व की शुरुआत उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ी है जब अल्लाह ने पैग़ंबर इब्राहीम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उनसे अपने प्रिय पुत्र इस्माईल की कुर्बानी देने को कहा। इब्राहीम ने पहले सपने को नजरअंदाज किया, लेकिन जब वही सपना लगातार तीन रातों तक आया, तब उन्होंने समझ लिया कि यह अल्लाह की सच्ची आज्ञा है। उन्होंने अपने बेटे इस्माईल को यह बात बताई। इस्माईल ने पूरी श्रद्धा और आज्ञा से खुद को अल्लाह के लिए कुर्बान करने के लिए तैयार कर लिया। जब इब्राहीम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की कुर्बानी दी, तो अल्लाह ने उनकी आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर उनके बेटे को बचा लिया और उसकी जगह एक दुम्बा (भेड़ या मेंढा) भेज दिया, जिसकी कुर्बानी दी गई।
इस प्रकार हजरत इब्राहीम की कुर्बानी को अल्लाह ने कबूल किया और इस्माईल को जीवनदान मिला। तब से यह घटना त्याग और आज्ञाकारिता की चरम मिसाल बन गई। इस घटना के प्रतीक के रूप में ही आज भी मुस्लिम समुदाय इस दिन पशु की कुर्बानी देता है।
बकरीद कैसे मनाई जाती है? (Bakrid Kaise Manate Hain)
इस दिन मुसलमान विशेष नमाज अदा करते हैं। फिर पैगंबर इब्राहीम की कुर्बानी की याद में बकरे की कुर्बानी दी जाती है। कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है – एक गरीबों को, एक रिश्तेदारों को और एक स्वयं के लिए रखा जाता है। यह दिन समाज में भाईचारे, सेवा और दान की भावना को बढ़ाता है।
