भगवान राम को समर्पित किया जाएगा 286 किलो वजनी कोदंड, जानिए क्या है ये और क्यों है इतना खास
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 22, 2026, 04:18 PM IST
What Is Kodand: 22 जनवरी 2024 को अयोध्या राम मंदिर में रामलला की बाल स्वरूप प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी। अब लगभग 2 साल बाद रामलला की अनमोल धरोहर ‘कोदंड’ को उनको समर्पित किया जा रहा है। जी हां, ओडिशा के राउरकेला से प्रभु श्रीराम की वो विरासत आ रही है, जिसके माध्यम से उन्होंने रावण समेत कई राक्षसों से पृथ्वी को मुक्त किया था। आइए जानते हैं प्रभु राम की यह विरासत क्या है और क्यों खास है?
क्या है कोदंड और क्यो हैं ये खास?
What Is Kodand: 22 जनवरी 2026 को अयोध्या एक बार फिर ऐतिहासिक और आध्यात्मिक साक्षी बनने जा रही है। भगवान श्रीराम से जुड़ी उनकी सबसे विशेष विरासत के रूप में ‘कोदंड’ आज अयोध्या पहुंच रहा है। कोदंड कोई साधारण धनुष नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के धर्म, मर्यादा और न्याय के आदर्शों का प्रतीक है। अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के लिए तैयार किया गया यह 286 किलोग्राम वजनी पंचधातु का भव्य कोदंड ओडिशा के राउरकेला से विशेष यात्रा के माध्यम से अयोध्या लाया गया है। यह यात्रा केवल एक वस्तु के स्थानांतरण की नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, आस्था और इतिहास को जोड़ने वाली आध्यात्मिक यात्रा मानी जा रही है।
कोदंड क्या है?
धर्मग्रंथों और रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम के धनुष का नाम कोदंड था। यही कारण है कि प्रभु श्रीराम को कोदंडधारी भी कहा जाता है। कोदंड सामान्य धनुष नहीं था, बल्कि एक चमत्कारी और दिव्य अस्त्र माना जाता था, जिसे कोई सामान्य योद्धा धारण नहीं कर सकता था। शास्त्रों के अनुसार, कोदंड का निर्माण बांस (बेंत) से हुआ था। देखने में सरल, लेकिन शक्ति में अद्वितीय यह धनुष धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक था। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने कोदंड की शक्ति और उसकी महिमा का विस्तार से उल्लेख किया है। यह धनुष इतना शक्तिशाली था कि इससे छोड़ा गया बाण लक्ष्य को भेदकर ही लौटता था। राक्षसों और अधर्मी शक्तियों में कोदंड का नाम सुनते ही भय व्याप्त हो जाता था।

भगवान राम
किस धातु का बना है कोदंड?
अयोध्या के श्रीराम मंदिर के लिए जो नया कोदंड तैयार किया गया है, उसका निर्माण ओडिशा के राउरकेला स्थित सनातन जागरण मंच द्वारा किया गया है।इसका वजन लगभग 286 किलोग्राम है। भगवान श्रीराम के लिए तैयार किए गए इस कोदंड के निर्माण में लगभग आठ महीने का समय लगा। इसे पंचधातु से निर्मित किया गया है, जिसमें सोना, चांदी, तांबा, लोहा और जिंक का विशेष संयोजन किया गया है। पारंपरिक भारतीय शिल्पकला और आधुनिक तकनीक के संतुलित उपयोग से इसे ऐसा स्वरूप दिया गया है, जो इसे न केवल भव्य बल्कि दिव्य भी बनाता है।
इस कोदंड की लंबाई लगभग आठ फीट और चौड़ाई करीब ढाई फीट है। तमिलनाडु के कांचीपुरम की 48 महिला कारीगरों ने लगभग आठ महीने की कठिन मेहनत से इसे आकार दिया। इस पंचधातु कोदंड की अनुमानित लागत लगभग सवा करोड़ रुपये बताई जा रही है, जो इसकी भव्यता, कलात्मकता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है।
शहीदों के नाम हैं अंकित
करीब आठ फीट लंबे इस कोदंड पर ऑपरेशन सिंदूर की सैन्य वीरता और कारगिल युद्ध में शहीद हुए वीर जवानों के नाम भी अंकित किए गए हैं। इस कारण यह कोदंड केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि देशभक्ति और बलिदान की स्मृति भी बन गया है।
कैसे अयोध्या पहुंचा यह कोदंड?
3 जनवरी 2026 को यह कोदंड ओडिशा के राउरकेला से रवाना हुआ। प्रस्थान के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। यह यात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से होकर गुजरी। 19 जनवरी को कोदंड पुरी पहुंचा, जहां भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए गए। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद इसे अयोध्या के लिए रवाना किया गया। तय कार्यक्रम के अनुसार 22 जनवरी 2026 को यह कोदंड अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर पहुंचा है।
अयोध्या में क्या होगा?
अयोध्या पहुंचने के बाद इस कोदंड को भगवान श्रीराम को अर्पित किया जाएगा। इसके बाद इसे श्रीराम मंदिर परिसर के संग्रहालय में स्थापित किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भगवान श्रीराम की इस दिव्य विरासत के दर्शन कर सकें।
कोदंड की क्या थी खासियत?
धर्मशास्त्रों के अनुसार कोदंड की कई विशेषताएं थीं। यह धनुष सामान्य बांस से बना होने के बावजूद दैवीय शक्ति से युक्त था। केवल वही इसे धारण कर सकता था, जो धर्म, संयम और मर्यादा का पालन करता हो। कहा जाता है कि कोदंड का वजन लगभग एक क्विंटल था। इसे उठाना भी हर किसी के वश की बात नहीं थी। रामायण काल में इसी कोदंड के माध्यम से भगवान श्रीराम ने अधर्म के विरुद्ध युद्ध किया। दंडकारण्य वन में रहते हुए उन्होंने राक्षसों का संहार किया और वनवासियों की रक्षा की।
दंडकारण्य और कोदंड का है गहरा संबंध
कई सनातन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान दंडकारण्य वन में लंबा समय बिताया। यह क्षेत्र रावण के प्रभाव में था और असुरों का गढ़ माना जाता था। मान्यता है कि कोदंड का निर्माण भी दंडकारण्य में ही हुआ था। इसी धनुष के माध्यम से भगवान श्रीराम ने रावण की सेना का नाश किया और धर्म की स्थापना की।
समुद्र सुखाने के लिए भी उठाया था कोदंड
रामायण की एक अत्यंत प्रसिद्ध घटना में भी कोदंड का उल्लेख मिलता है। जब लंका जाने के लिए समुद्र पार करने के लिए उन्होंने समुद्र से मार्ग बताने के लिए विनय किया, लेकिन समुद्र ने अपने अभिमान में प्रभु राम की विनय नहीं सुनी। जब प्रभु श्रीराम को कोई मार्ग नहीं दिखा, तब उन्होंने कोदंड पर प्रत्यंचा चढ़ाकर समुद्र को सुखाने का संकल्प लिया।
जैसे ही भगवान श्रीराम ने धनुष पर बाण चढ़ाया, समुद्र के देवता वरुणदेव प्रकट हो गए और क्षमा याचना करने लगे। उनके अनुरोध पर भगवान श्रीराम ने अपना बाण वापस रख लिया। यह प्रसंग कोदंड की शक्ति और प्रभु श्रीराम के संयम दोनों को दर्शाता है।
जयंत प्रसंग और कोदंड की शक्ति
रामचरितमानस में जयंत की कथा में कोदंड की शक्ति का वर्णन है। कथा के अनुसार, जब देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप लेकर माता सीता के चरणों में चोंच मारी और उनके पैरों से रक्त बहने लगा। दरअसल, जयंत ने जब माता सीता के पैर पर चोंच मारी तो उसकी दृष्टि माता पर गलत थी। इस कारण भगवान श्रीराम ने कोदंड पर बाण चढ़ाया। जिसपर तुलसीदास जी लिखते हैं कि ‘देखि राम रिपु दल चलि आवा। बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा॥’ इस बाण से बचने के लिए जयंत पूरे ब्रह्मांड में भटकता रहा, लेकिन कहीं शरण नहीं मिली। अंततः उसे श्रीराम की शरण में ही आना पड़ा।