Puja Aarti Performing Rules and Significance: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा के बाद आरती करने का विशेष महत्व होता है। फिर चाहे वह घर की पूजा-पाठ हो मंदिर में या कोई विशेष अनुष्ठान, बिना आरती के कोई भी पूजा संपन्न नहीं मानी जाती है। लेकिन शास्त्रों में आरती करने के महत्व के साथ ही इसके नियम के बारे में भी बताया गया है, जिसका पालन करने के बाद ही पूजा सफल और संपन्न होती है। साथ ही आरती करने से भगवान भी शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
आरती करने के नियम
- आरती हमेशा ही पीतल, तांबे या चांदी की थाली में करनी चाहिए। क्योंकि हिंदू धर्म में इन पात्रों को शुद्ध माना गया है।
- आरती के लिए स्टील, एल्युमिनियम या लोहे की धातु से बनी थाली का प्रयोग न करें। बल्कि पूजा-पाठ में इन धातुओं के किसी भी पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- आरती की थाली में भोग, कपूर, फूल, अक्षत, कुमकुम, धूप, दीप आदि को सजाकर रखें।
- आरती की शुरुआत हमेशा भगवान के चरणों से करें, इसके बाद भगवान के नाभि के पास आरती घुमाएं और इसके बाद भगवान के मुख के पास आरती घुमानी चाहिए।
आरती का महत्व
शास्त्रों के अनुसार आरती करने का अर्थ है देव पूजा से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति, जिससे कि हमारा मन प्रकाशित और भविष्य उज्जवल होता है। आरती करने का यह भी अर्थ है कि पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूबना। कहा जाता है कि आरती करने के बाद भगवान पूजा को पूरी तरह से स्वीकार करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार आरती करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है। स्कंद पुराण में भगवान विष्णु ने आरती के महत्व को बताते हुए कहा है कि, जो व्यक्ति पूजा में घी के दीपक और बाती से आरती करता है उसे कोटिकल्पों तक स्वर्गलोक में निवास प्राप्त होता है। इतना ही नहीं जो व्यक्ति भगवान विष्णु की पूजा में कपूर से आरती के करता है और जो लोग आरती के दौरान उपस्थित रहते हैं उन्हें अनंत में प्रवेश मिलता है।
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
