ट्रेनों को चलाने के लिए बिजली के साथ-साथ पड़ती है रेत की भी जरूरत, क्या आप जानते थे यह बात, इंजन में इस जगह होता है मौजूद

ट्रेनों को चलाने के लिए बिजली के साथ-साथ पड़ती है रेत की भी जरूरत, क्या आप जानते थे यह बात, इंजन में इस जगह होता है मौजूद

Authored by: Pankaj YadavUpdated Sep 11 2026, 15:17 IST
​ट्रेन को चलाने के लिए पड़ती है इसकी जरूरत Image Credit : AI Generated Image, Social Media01 / 08

​ट्रेन को चलाने के लिए पड़ती है इसकी जरूरत

जब भी हम ट्रेन को देखते हैं, तो हमारे मन में सबसे पहले यही सवाल आता है कि आखिर इतनी भारी-भरकम ट्रेन चलती कैसे है? बिजली से चलने वाले इंजन अपनी ताकत से हजारों टन वजन को खींचते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि ट्रेन को सही तरीके से चलाने के लिए बिजली के अलावा एक और चीज बेहद जरूरी होती है? ट्रेन को चलाने के लिए जितनी जरूरी बिजली है, उतनी ही जरूरी चीज ये भी है।

पटरी पर चलने वाली सभी ट्रेनों में होता है इसका इस्तेमालImage Credit : AI Generated Image, Social Media02 / 08

पटरी पर चलने वाली सभी ट्रेनों में होता है इसका इस्तेमाल

हम जिस चीज की बात कर रहे हैं वह है रेत। जी हां, सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन भारतीय रेलवे समेत दुनिया भर की कई ट्रेनों में रेत का इस्तेमाल किया जाता है। यह रेत किसी यात्री के लिए नहीं, बल्कि इंजन के पहियों और रेल की पटरी के बीच पकड़ मजबूत बनाने के काम आती है।

इंजन में कहां रखी होती है रेत?Image Credit : AI Generated Image, Social Media03 / 08

इंजन में कहां रखी होती है रेत?

ट्रेन के इंजन में एक खास व्यवस्था होती है, जिसे सैंडिंग सिस्टम या सैंडर कहा जाता है। इसमें विशेष प्रकार की सूखी और बारीक रेत रखी जाती है। यह रेत इंजन के पहियों के ऊपर या आसपास बने विशेष सैंड बॉक्स में मौजूद रहती है। जरूरत पड़ने पर इसे एक पाइप के जरिए पहियों और रेल की पटरी के संपर्क वाली जगह पर गिराया जाता है। अब सवाल उठता है कि इसकी जरूरत आखिर पड़ती क्यों है?

जब पहिए पटरी पर फिसलने लगते हैंImage Credit : AI Generated Image, Social Media04 / 08

जब पहिए पटरी पर फिसलने लगते हैं

ट्रेन का इंजन बेहद भारी होता है और उसे हजारों टन वजन खींचना पड़ता है। खासकर जब ट्रेन स्टेशन से चलना शुरू करती है या किसी चढ़ाई वाले रास्ते पर आगे बढ़ती है, तब पहियों को काफी ताकत लगानी पड़ती है। कभी-कभी रेल की पटरी गीली हो जाती है। बारिश, नमी, तेल, धूल या किसी अन्य कारण से पहियों और पटरी के बीच पकड़ कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में इंजन के पहिए घूम तो सकते हैं, लेकिन ट्रेन आगे नहीं बढ़ पाती।

आसान भाषा में समझेंImage Credit : AI Generated Image, Social Media05 / 08

आसान भाषा में समझें

इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए जैसे आप गीली जमीन पर फिसल रहे हों। आपके पैरों को जमीन पर सही पकड़ नहीं मिलती लेकिन अगर जमीन पर थोड़ा सूखा पदार्थ या रेत डाल दी जाए, तो पकड़ बेहतर हो जाती है। ठीक इसी तरह ट्रेन के पहियों के नीचे रेत डाली जाती है।

रेत ट्रेन की पकड़ कैसे बढ़ाती है?Image Credit : AI Generated Image, Social Media06 / 08

रेत ट्रेन की पकड़ कैसे बढ़ाती है?

जब सैंडिंग सिस्टम काम करता है, तो सूखी रेत पहिए और रेल की पटरी के बीच पहुंचती है। इससे दोनों सतहों के बीच घर्षण यानी पकड़ बढ़ जाती है। नतीजा यह होता है कि इंजन के पहिए पटरी पर बेहतर तरीके से पकड़ बना पाते हैं और ट्रेन आगे बढ़ने लगती है। यह व्यवस्था सिर्फ ट्रेन को चलाने में ही मदद नहीं करती, बल्कि कई बार उसे सुरक्षित तरीके से रोकने में भी उपयोगी होती है। फिसलन वाली पटरी पर ब्रेक लगाते समय भी पहियों की पकड़ महत्वपूर्ण होती है।

क्या हर ट्रेन में रेत की जरूरत पड़ती है?Image Credit : AI Generated Image, Social Media07 / 08

क्या हर ट्रेन में रेत की जरूरत पड़ती है?

हर समय नहीं। सामान्य मौसम और सूखी पटरी पर ट्रेन बिना रेत के भी आसानी से चलती रहती है। सैंडिंग सिस्टम का इस्तेमाल खास परिस्थितियों में किया जाता है। भारतीय रेलवे के इलेक्ट्रिक और डीजल लोकोमोटिव में ऐसी व्यवस्था मौजूद होती है। लोको पायलट या इंजन की स्वचालित प्रणाली जरूरत के अनुसार रेत का इस्तेमाल कर सकती है।

यह छोटी सी चीज कितनी महत्वपूर्ण है?Image Credit : AI Generated Image, Social Media08 / 08

यह छोटी सी चीज कितनी महत्वपूर्ण है?

ट्रेन चलाने की पूरी प्रक्रिया में कई बड़े और शक्तिशाली सिस्टम काम करते हैं। इंजन, मोटर, ब्रेक, पहिए और बिजली, इन सभी की अपनी अहम भूमिका है लेकिन इनके बीच रेत जैसी साधारण दिखने वाली चीज भी ट्रेन की कार्यक्षमता और सुरक्षा में बड़ा योगदान देती है। यही रेलवे की इंजीनियरिंग की खासियत है। बड़ी मशीनों के पीछे कई छोटी-छोटी चीजें मिलकर काम करती हैं, जिनके बिना पूरी व्यवस्था अधूरी हो सकती है।

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