अखबार इतने बड़े क्यों होते हैं? 300 साल पुराना है राज, रोज पढ़ते हैं, जानते नहीं होंगे

स्मार्टफोन और टैबलेट के दौर में भी अखबार छप रहा है और लोग पढ़ भी रहे हैं। आप भी शायद रेगुलर तो नहीं, लेकिन कभी तो अखबार जरूर पढ़ा होगा। आपने भले ही अखबार पढ़ा होगा, लेकिन कभी शायद ही नोटिस किया होगा कि आखिर अखबार का साइज इतना बड़ा ही क्यों होता है और उन्हें मोड़कर पढ़ना इतना मुश्किल क्यों होता है। दिलचस्प बात यह है कि इसका संबंध पत्रकारिता से कम और 300 साल पुराने एक ब्रिटिश टैक्स कानून से ज्यादा है। आइए जानते हैं...

Authored by: प्रदीप पाण्डेयUpdated Jun 3 2026, 15:34 IST
हाल ही में उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें अखबारों के बड़े आकार के पीछे की रोचक कहानी बताई गई। यह जानकारी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के बीच काफी चर्चा शुरू हो गई।Image Credit : Canva01 / 09

हाल ही में उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें अखबारों के बड़े आकार के पीछे की रोचक कहानी बताई गई। यह जानकारी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के बीच काफी चर्चा शुरू हो गई।

1712 के टैक्स कानून से शुरू हुई कहानीImage Credit : Canva02 / 09

1712 के टैक्स कानून से शुरू हुई कहानी

अखबारों के बड़े आकार की कहानी वर्ष 1712 में ब्रिटेन से शुरू होती है। उस समय सरकार ने अखबारों पर स्टाम्प ड्यूटी नामक टैक्स लागू किया था। इस टैक्स की खास बात यह थी कि प्रकाशकों से अखबार के आकार के आधार पर नहीं, बल्कि उसमें छपे पन्नों की संख्या के आधार पर कर वसूला जाता था। ऐसे में अखबार मालिकों ने टैक्स बचाने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला।

कम टैक्स देने के लिए बढ़ाया गया पन्नों का आकारImage Credit : Canva03 / 09

कम टैक्स देने के लिए बढ़ाया गया पन्नों का आकार

प्रकाशकों ने पन्नों की संख्या बढ़ाने के बजाय प्रत्येक पन्ने का आकार बड़ा कर दिया। इससे कम पन्नों में ज्यादा खबरें, विज्ञापन और अन्य सामग्री प्रकाशित की जा सकती थी और टैक्स भी कम देना पड़ता था। यह तरीका धीरे-धीरे पूरे समाचार उद्योग में लोकप्रिय हो गया और बड़े आकार वाले "ब्रॉडशीट" अखबारों की शुरुआत हुई।

टैक्स खत्म होने के बाद भी क्यों नहीं बदला आकार?Image Credit : Canva04 / 09

टैक्स खत्म होने के बाद भी क्यों नहीं बदला आकार?

ब्रिटेन में यह स्टाम्प टैक्स वर्ष 1855 में समाप्त कर दिया गया था। लेकिन तब तक बड़े आकार के अखबार उद्योग का हिस्सा बन चुके थे। प्रिंटिंग मशीनें बड़े पन्नों के हिसाब से तैयार की जा चुकी थीं, वितरण व्यवस्था उसी के अनुरूप विकसित हो चुकी थी और पाठक भी इस फॉर्मेट के अभ्यस्त हो गए थे। ऐसे में छोटे आकार में बदलाव करना महंगा और जटिल साबित हो सकता था। इसलिए अधिकांश अखबारों ने पुराना फॉर्मेट ही जारी रखा।

भारत तक पहुंची यह परंपराImage Credit : Canva05 / 09

भारत तक पहुंची यह परंपरा

ब्रिटिश प्रकाशन मॉडल के दुनिया भर में फैलने के साथ भारत समेत कई देशों ने भी इसी ब्रॉडशीट फॉर्मेट को अपनाया। आज भी भारत के कई प्रमुख अखबार बड़े आकार में प्रकाशित होते हैं। बड़े पन्नों में विस्तृत रिपोर्ट, बड़े शीर्षक, आकर्षक तस्वीरें और संपादकीय कार्टून के लिए पर्याप्त जगह मिलती है। यही वजह है कि कई पाठक बड़े आकार के अखबारों को गंभीर और विश्वसनीय पत्रकारिता से जोड़कर देखते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने जताई हैरानीImage Credit : Canva06 / 09

सोशल मीडिया पर लोगों ने जताई हैरानी

हर्ष गोयनका द्वारा साझा किए गए वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अखबारों का आकार किसी संपादकीय निर्णय की वजह से नहीं, बल्कि सदियों पुराने टैक्स नियम की वजह से तय हुआ था।

ब्रिटिश विरासतImage Credit : Canva07 / 09

ब्रिटिश विरासत

कई यूजर्स ने कहा कि इतिहास में बनाए गए नियम अक्सर इतने लंबे समय तक असर छोड़ जाते हैं कि लोग उनके पीछे की असली वजह ही भूल जाते हैं। वहीं कुछ लोगों ने मजाक में कहा कि बड़े आकार के अखबार आज भी रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद सबसे लंबे समय तक चले आ रहे "ब्रिटिश विरासत" के उदाहरणों में से एक हैं।

आज भी कायम है पुरानी परंपराImage Credit : Canva08 / 09

आज भी कायम है पुरानी परंपरा

डिजिटल युग में जहां अधिकांश खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ी जाती हैं, वहीं सुबह की चाय के साथ बड़े आकार का अखबार पढ़ने की परंपरा आज भी लाखों भारतीय घरों और दफ्तरों में जीवित है।

दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत पत्रकारिता की जरूरत से नहीं, बल्कि 300 साल पुराने एक टैक्स कानून से हुई थी।Image Credit : Canva09 / 09

दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत पत्रकारिता की जरूरत से नहीं, बल्कि 300 साल पुराने एक टैक्स कानून से हुई थी।

End of Photo Gallery
Subscribe to our daily Newsletter!