अखबारों के बड़े आकार की कहानी वर्ष 1712 में ब्रिटेन से शुरू होती है। उस समय सरकार ने अखबारों पर स्टाम्प ड्यूटी नामक टैक्स लागू किया था। इस टैक्स की खास बात यह थी कि प्रकाशकों से अखबार के आकार के आधार पर नहीं, बल्कि उसमें छपे पन्नों की संख्या के आधार पर कर वसूला जाता था। ऐसे में अखबार मालिकों ने टैक्स बचाने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला।
प्रकाशकों ने पन्नों की संख्या बढ़ाने के बजाय प्रत्येक पन्ने का आकार बड़ा कर दिया। इससे कम पन्नों में ज्यादा खबरें, विज्ञापन और अन्य सामग्री प्रकाशित की जा सकती थी और टैक्स भी कम देना पड़ता था। यह तरीका धीरे-धीरे पूरे समाचार उद्योग में लोकप्रिय हो गया और बड़े आकार वाले "ब्रॉडशीट" अखबारों की शुरुआत हुई।
ब्रिटेन में यह स्टाम्प टैक्स वर्ष 1855 में समाप्त कर दिया गया था। लेकिन तब तक बड़े आकार के अखबार उद्योग का हिस्सा बन चुके थे। प्रिंटिंग मशीनें बड़े पन्नों के हिसाब से तैयार की जा चुकी थीं, वितरण व्यवस्था उसी के अनुरूप विकसित हो चुकी थी और पाठक भी इस फॉर्मेट के अभ्यस्त हो गए थे। ऐसे में छोटे आकार में बदलाव करना महंगा और जटिल साबित हो सकता था। इसलिए अधिकांश अखबारों ने पुराना फॉर्मेट ही जारी रखा।
ब्रिटिश प्रकाशन मॉडल के दुनिया भर में फैलने के साथ भारत समेत कई देशों ने भी इसी ब्रॉडशीट फॉर्मेट को अपनाया। आज भी भारत के कई प्रमुख अखबार बड़े आकार में प्रकाशित होते हैं। बड़े पन्नों में विस्तृत रिपोर्ट, बड़े शीर्षक, आकर्षक तस्वीरें और संपादकीय कार्टून के लिए पर्याप्त जगह मिलती है। यही वजह है कि कई पाठक बड़े आकार के अखबारों को गंभीर और विश्वसनीय पत्रकारिता से जोड़कर देखते हैं।
हर्ष गोयनका द्वारा साझा किए गए वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अखबारों का आकार किसी संपादकीय निर्णय की वजह से नहीं, बल्कि सदियों पुराने टैक्स नियम की वजह से तय हुआ था।
कई यूजर्स ने कहा कि इतिहास में बनाए गए नियम अक्सर इतने लंबे समय तक असर छोड़ जाते हैं कि लोग उनके पीछे की असली वजह ही भूल जाते हैं। वहीं कुछ लोगों ने मजाक में कहा कि बड़े आकार के अखबार आज भी रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद सबसे लंबे समय तक चले आ रहे "ब्रिटिश विरासत" के उदाहरणों में से एक हैं।
डिजिटल युग में जहां अधिकांश खबरें मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ी जाती हैं, वहीं सुबह की चाय के साथ बड़े आकार का अखबार पढ़ने की परंपरा आज भी लाखों भारतीय घरों और दफ्तरों में जीवित है।