आप जंगल में हैं और यहां चारों ओर हरियाली, नीचे बहती नदी और सामने ऐसा पुल, जिसे न लोहे से बनाया गया है और न ही सीमेंट से। जी हां देश में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहां लिविंग रूट ब्रिज आपकी यात्रा का माध्यम बन सकते हैं। ये पुल पेड़ की जड़ों से तैयार होते हैं।
इन लिविंग रूट ब्रिज का इतिहास सदियों पुराना है। देश में मौजूद कई लिविंग ब्रिज 100 से 500 साल या उससे भी अधिक पुराने माने जाते हैं।
बारिश का मौसम जंगलों को हरियाली की चादर से ढक देता है। यही वजह है कि मानसून के सीजन में लिविंग रूट ब्रिज की खूबसूरती और भी ज्यादा निखर जाती है।
आपने देखा होगा कि सीमेंट सरिया से तैयार मजबूत से मजबूत ब्रिज भी समय के साथ कमजोर होता चला जाता है, लेकिन ये लिविंग रूट ब्रिज की खासियत है कि इनकी मजबूती समय के साथ और ज्यादा बढ़ जाती है।
यदि आप लिविंग रूट ब्रिज देखने का प्लान बना रहे हैं, तो आपको जुलाई से सितंबर के बीच जाना चाहिए। इस दौरान देश में मानसून का सीजन होता है और यहां आपको शानदार नजारे देखने को मिलेंगे।
मेघालय की हरी-भरी खासी और जयंतिया पहाड़ियों में बसे सोहरा (चेरापूंजी), नोंगरियात और मावलिननोंग जैसे गांव लिविंग रूट ब्रिज के लिए पूरी दुनिया में फेमस हैं। इनमें भी सबसे खास मेघालय का सबसे लंबा लिविंग रूट ब्रिज है। इसकी लंबाई लगभग 175 फीट बताई जाती है।
लिविंग रूट ब्रिज इंसान और प्रकृति के बीच हो रहे सस्टेनेबल डेवलपमेंट का शानदार उदाहरण हैं। यह ब्रिज ये बात साफ-साफ बताते हैं कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं।