उम्र बढ़ाने वाली टेक्नोलॉजी की दौड़ में बड़े टेक दिग्गज, जेफ बेजोस से लेकर गोयल तक करोड़ों का कर रहे निवेश
टेक्नोलॉजी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। जहां अभी तक दुनियाभर में नए नए गैजेट्स को डिजाइन किया जा रहा था, वहीं अब मनुष्य की उम्र बढ़ाने पर भी रिसर्च शुरू हो चुकी है। जेफ बेजोस से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक कई टेक अरबपति इस इंडस्ट्री में हजारों करोड़ रुपये का निवेश कर रहे हैं।
Authored by: गौरव तिवारीUpdated Dec 12 2025, 13:36 IST
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दुनिया के बड़े टेक अरबपति अब उम्र बढ़ाने की तकनीक को अगला बड़ा ट्रेंड मान रहे हैं। पिछले दस सालों में इस क्षेत्र की रिसर्च पर अरबों डॉलर का निवेश हुआ है। इन अरबपतियों का मानना है कि मौत कोई तय किस्मत नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग से जुड़ी समस्या है, जिसे विज्ञान, एआई और बायोटेक की मदद से हल किया जा सकता है।
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टेक दिग्गज के पास इस रिसर्च के लिए बड़ा धैर्य और पैसा दोनों ही है। इसी वजह से जेफ बेजोस से लेकर मार्क जकरबर्ग तक, कई बड़े टेक दिग्गज उम्र बढ़ाने से जुड़ी लैबों और रिसर्च में खुलकर निवेश कर रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि लैरी एलिसन ने एलिसन मेडिकल फाउंडेशन के ज़रिए बुढ़ापे पर रिसर्च के लिए 43 करोड़ डॉलर (लगभग 3,880 करोड़ रुपये) दान किए हैं।
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दूसरी तरफ, अमेज़न के मालिक जेफ बेजोस Altos Labs में सेलुलर री-जुवेनेशन पर निवेश कर रहे हैं, जिसका लक्ष्य बीमारियों को उलटने यानी ठीक करने की दिशा में काम करना है।
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लैरी पेज अपनी कंपनी Calico Labs के जरिए एंटी-एजिंग रिसर्च में इनवेस्ट कर रहे हैं, जबकि सैम ऑल्टमैन ने Retro Biosciences में लगभग 18 करोड़ डॉलर (करीब 1,625 करोड़ रुपये) का निवेश किया है। इसके अलावा, सर्गेई ब्रिन भी पार्किंसन बीमारी की रिसर्च पर 9,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुके हैं।
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मार्क जकरबर्ग और प्रिस्किला चान ने विज्ञान और गणित के क्षेत्र में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘ब्रेकथ्रू प्राइज’ शुरू किया है। इसके अलावा, उन्होंने अपनी CGI संस्था के माध्यम से लाइफ साइंस रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए लाखों रुपये का योगदान भी दिया है।
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बैंक ऑफ अमेरिका के अनुसार, लॉन्जेविटी साइंस, एआई और नई तकनीकों की मदद से करीब 54.2 लाख करोड़ रुपये की एक नई इंडस्ट्री तेजी से विकसित हो रही है। इस उद्योग का मकसद इंसानों की उम्र को बढ़ाकर 120 साल तक जीने को संभव बनाना है। इसमें जीनोमिक्स, एआई-आधारित हेल्थकेयर और नई दवाओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
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इस उम्र बढ़ाने वाली रिसर्च का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 700 कंपनियां ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक पर काम कर रही हैं। उम्मीद है कि यह इंडस्ट्री 2030 तक करीब 55,998 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच सकती है।
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जोमैटो और ब्लिंकिट की पैरेंट कंपनी एटर्नल के सीईओ दीपिंदर गोयल का ‘टेम्पल’ प्रोजेक्ट भी इस दौड़ में भारत की बड़ी एंट्री माना जा रहा है। यह एक ऐसा डिवाइस है जिसे पहनकर दिमाग की गतिविधियों और सिग्नल्स को मापा जा सकता है।
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इसका उद्देश्य दिमाग को कंप्यूटर की अगली पीढ़ी के रूप में उपयोग करने की दिशा में काम करना है। माना जा रहा है कि यह पहल भारत में लॉन्जेविटी टेक को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।