चातुर्मास की अवधि में व्यक्ति को अपनी दिनचर्या, खानपान और व्यवहार में सात्विकता अपनाकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। यही कारण है कि इस समय कुछ कार्यों से बचने और कुछ विशेष नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलने वाले इन चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।
चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य शुभ मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते हैं।
चातुर्मास मन और व्यवहार को भी शुद्ध करने का अवसर माना जाता है। इस दौरान झूठ बोलने, क्रोध करने, अहंकार दिखाने और कटु वचन कहने से बचने की सलाह दी जाती है।
चातुर्मास की अवधि में मांस, मदिरा और अन्य तामसिक भोजन से दूर रहने की परंपरा है। इन दिनों में अधिक तला-भुना, मसालेदार और अत्यधिक तेलयुक्त भोजन खाने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है।
चातुर्मास में बैंगन और कुछ पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करने की परंपरा है। आस्था के अलावा इन सब्जियों में मानसून में कीड़े पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
इस समय में भोग-विलास, असंयमित दिनचर्या और अत्यधिक सांसारिक आकर्षण से दूरी बनाने पर विशेष बल दिया जाता है।