श्रीहरिकोटा का स्थान भूमध्य रेखा के करीब है, लगभग 13.7° उत्तर अक्षांश पर। भूमध्य रेखा के पास लॉन्चिंग से लाभ होता है क्योंकि धरती की घूर्णन गति यहां अधिक होती है, जिससे रॉकेट को शुरुआती गति मिलती है। इससे ईंधन की बचत होती है और भारी उपग्रहों को आसानी से कक्षा में पहुंचाया जा सकता है। (फोटो- ISRO)
रॉकेट लॉन्चिंग के दौरान उड़ान पथ में पड़ने वाले इलाके देश के आंतरिक हिस्से में होने चाहिए या समुद्र की तरफ, ताकि दुर्घटना या किसी तकनीकी समस्या की स्थिति में नुकसान कम हो। श्रीहरिकोटा की जगह इस लिहाज से बेहतर है। (फोटो- ISRO)
श्रीहरिकोटा के पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। इससे रॉकेट के उड़ान मार्ग में कहीं भी आबादी या अन्य संपत्तियों पर खतरा नहीं रहता। जबकि थुम्बा के निकट पश्चिम में अरब सागर है, लेकिन वहां से लॉन्च करने पर रॉकेट का मार्ग अधिकतर जमीन के ऊपर से गुजरता है, जिससे खतरा बढ़ जाता है। (फोटो- ISRO)
श्रीहरिकोटा में पहले से ही पूरी लॉन्चिंग सुविधा, परीक्षण लैब, कंट्रोल सेंटर और वैज्ञानिक केंद्र स्थापित हैं। यह पूरे सेटअप बहुत बड़ा और जटिल होता है, इसलिए एक ही जगह पर इसे संचालित करना बेहतर होता है। (फोटो- ISRO)
श्रीहरिकोटा का मौसम अपेक्षाकृत स्थिर और अनुकूल रहता है, जो लॉन्चिंग के लिए जरूरी होता है। जो स्पेस मिशन लॉन्चिंग के लिए काफी जरूरी है। (फोटो- ISRO)
थुम्बा का उपयोग आरंभिक प्रयोगों के लिए किया गया था, लेकिन वह एक बहुत छोटा स्टेशन था, जो केवल साउंडिंग रॉकेट्स के लिए उपयुक्त था। थुम्बा का भौगोलिक स्थान और सीमित इन्फ्रास्ट्रक्चर बड़े उपग्रह लॉन्च मिशनों के लिए उपयुक्त नहीं था। (फोटो- ISRO)
श्रीहरिकोटा के अलावा भारत ने एक नया लॉन्च सेंटर, श्रीपेरुम्बुदूर (Sriharikota के पास), विकसित करने की योजना बनाई है ताकि बड़ी और भारी लॉन्चिंग मिशनों को सपोर्ट किया जा सके। इसके अलावा, पुनः प्रयोग योग्य लॉन्चिंग तकनीक के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। (फोटो- ISRO)