शुरुआती या बीच के सेमेस्टर में बैक लगने से किसी भी छात्र की डिग्री तुरंत रद्द नहीं होती है। विश्वविद्यालय छात्रों को फेल हुए विषयों को दोबारा पास करने के लिए 'बैकलॉग/सप्लीमेंट्री परीक्षा' देने का पूरा मौका देते हैं। डिग्री रद्द होने की स्थिति तब ही आती है जब छात्र तय की गई अधिकतम समय-सीमा के भीतर अपने सभी विषयों को क्लियर नहीं कर पाता है।
UGC और तकनीकी विश्वविद्यालयों की गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी डिग्री कोर्स को पूरा करने के लिए 'N+2 नियम' या कुछ संस्थानों में N+3 नियम लागू होता है। यहां 'N' का मतलब कोर्स की सामान्य अवधि (बीटेक के लिए 4 साल) से है और '+2' का मतलब अतिरिक्त 2 साल की छूट से है। इस नियम के तहत 4 साल के बीटेक कोर्स को पूरा करने के लिए छात्रों को अधिकतम 6 साल (8+4 = 12 सेमेस्टर) का समय मिलता है।
बीटेक के छात्रों को नियमित सेमेस्टर परीक्षाओं के साथ-साथ बैक पेपर देने की सुविधा मिलती है। छात्र ऑड सेमेस्टर की बैक अगले ओड सेमेस्टर में और सम यानी Even सेमेस्टर की बैक अगले ईवन सेमेस्टर में दे सकते हैं। उदाहरण के लिए समेस्टर 1 की बैक परीक्षा समेस्टर 3 में और सेमेस्टर 2 की बैक परीक्षा सेमेस्टर 4 में। अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए कई विश्वविद्यालय 'स्पेशल कैरी ओवर एग्जाम' या 'समर एग्जाम' भी आयोजित करते हैं, ताकि उनका एक साल खराब न हो।
यदि कोई छात्र निर्धारित अधिकतम समय-सीमा (जैसे 6 या 7 वर्ष) में अपने सभी बैक पेपर को पास करने में सफल नहीं हो पाते हैं, तो उनका रजिस्ट्रेशन समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय द्वारा छात्र को डिग्री नहीं दी जाती। हालांकि, छात्र ने जितने सेमेस्टर सफलतापूर्वक पास किए हैं, उसकी मार्कशीट मिल सकती है।
सब्जेक्ट बैक में छात्र केवल 1 या 2 विषयों में फेल होता है, लेकिन उसे अगली कक्षा या सेमेस्टर में प्रमोट कर दिया जाता है। जबकि ईयर बैक में किसी सेमेस्टर में फेल हुए विषयों की संख्या तय सीमा से अधिक हो जाती है, तो छात्र को अगली कक्षा में प्रोमोशन नहीं मिलता। उसे वह पूरा साल दोबारा दोहराना पड़ता है।
कैंपस प्लेसमेंट के समय यदि आपकी कोई बैक पेंडिंग है, तो कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) आपको इंटरव्यू में बैठने की अनुमति नहीं देती हैं। वहीं डेड बैक यदि आपने समय रहते बैक क्लियर कर ली है, तो अधिकांश कंपनियां आपको अवसर देती हैं, हालांकि कुछ कंपनियां 'नो गैप/नो बैकलॉग' की सख्त नीति का पालन करती है।
बैक से बचने के लिए छात्रों को अपने विश्वविद्यालय के क्रेडिट अंक और पासिंग क्राइटेरिया को अच्छी तरह समझें। वह इंटरनल असेसमेंट और प्रैक्टिकल में अच्छे अंक हासिल करने से ओवरऑल पास होने में आसानी होती है। साथ ही बैकलॉग को कभी पेंडिंग न छोड़ें। इसका अर्थ है कि जिस सेमेस्टर में बैक लगे, उसे अगले ही उपलब्ध अवसर में क्लियर करने का प्रयास करें।