इसकी वजह हमारा दिमाग है। जब हम संगीत सुनते हैं तो दिमाग लगातार अंदाजा लगाता रहता है कि अगली धुन, आवाज या ताल कैसी होगी। यानी संगीत सुनते समय दिमाग सिर्फ सुन नहीं रहा होता, बल्कि आगे क्या आने वाला है, इसका अनुमान भी लगा रहा होता है।
अब अगर गाने में अचानक कुछ ऐसा हो जाए जिसकी हमें उम्मीद नहीं थी, तो दिमाग उसे तुरंत नोटिस करता है। ऐसे बदलाव दिमाग की बनाई उम्मीद को तोड़ते हैं। वैज्ञानिक इसे एक्सपेक्टेंसी वॉयलेशन कहते हैं।
ऐसे अचानक बदलाव का असर शरीर के नर्वस सिस्टम पर भी पड़ता है। दिमाग कुछ पल के लिए इस बदलाव को संभावित खतरे की तरह ले सकता है। इससे शरीर की फाइट या फ्लाइट प्रतिक्रिया सक्रिय हो सकती है। इसी कारण रोंगटे खड़ें हो जाते हैं।
कुछ ही पल में दिमाग समझ जाता है कि कोई खतरा नहीं है। इसके बाद तनाव की जगह राहत और आनंद का एहसास आने लगता है। दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम सक्रिय होता है और डोपामिन जैसे रसायन इसमें भूमिका निभाते हैं। तनाव आखिर में सुखद अनुभव में बदल सकती है।
यादों का भी इसमें बड़ा हाथ है। किसी गाने से अगर बचपन, कोई खास इंसान, पुराना रिश्ता या जिंदगी का कोई खास दौर जुड़ा है तो उसे सुनते ही वही भावनाएं फिर से जाग सकती हैं।
कई बार गाने का क्लाइमैक्स, अचानक बढ़ती आवाज, नया इंस्ट्रूमेंट या आवाज में बदलाव ही वह पल होता है, जब रोंगटे खड़े होते हैं। दिमाग संगीत की धुन, लय, यादों और भावनाओं को एक साथ प्रोसेस करता है। इसी वजह से संगीत शरीर में भी महसूस होने लगता है।