Ayurvedic Herbs For Digestion In Monsoon : बारिश का मौसम सुहावना जरूर होता है, लेकिन शरीर के लिए यह मौसम कई तरह के बदलाव लेकर आता है। आयुर्वेद के अनसुरा वर्षा ऋतु के दौरान जठराग्नि यानी पाचन शक्ति के कमजोर हो जाती है। पाचन शक्ति कमजोर होने पर खाना ठीक से न पचने, पेट भारी रहने और गैस जैसी परेशानियां होने लगती हैं। इसके साथ ही इन दिनों में इम्युनिटी पावर भी कमजोर हो जाती है। इसके चलते वायरल फीवर, जुकाम आदि का खतरा बढ़ जाता है। आयुर्वेद में आचार्य चरक ने चरक संहिता के सूत्र स्थान में वर्षा ऋतु के प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया है। यहां बताया गया है कि इस मौसम में शरीर कमजोर होता है और पाचन करने वाली अग्नि भी प्रभावित होती है।चरक संहिता में कहा गया है।आदानदुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः।स वर्षास्वनिलादीनां दूषणैर्बाध्यते पुनः॥३३॥भूबाष्पान्मेघनिस्यन्दात् पाकादम्लाज्जलस्य च।वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः॥३४॥इसका मतलब है कि वर्षा ऋतु में शरीर पहले से कमजोर स्थिति में होता है और पाचन शक्ति भी कमजोर पड़ती है। बारिश के मौसम में वात आदि दोष प्रभावित हो सकते हैं। आयुर्वेद में इसी वजह से इस मौसम में भोजन और दिनचर्या को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।ऐसे में आयुर्वेद में कुछ ऐसी जड़ी-बूटियों और मसालों का वर्णन मिलता है, जिन्हें दीपन-पाचन यानी पाचन शक्ति को सहारा देने वाला बताया गया है। आइए जानते हैं कि वे कौन सी हर्ब्स हैं।
सोंठ यानी सूखी अदरक आयुर्वेद की सबसे चर्चित पाचन हर्ब्स में शामिल है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे शुण्ठी और नागर नाम से भी जाना जाता है। चरक संहिता में शुण्ठी को ऐसे द्रव्यों में शामिल किया गया है जो दीपन यानी पाचन शक्ति को बढ़ाने का काम करते हैं। इसी कारण पंचकोल नाम की आयुर्वेदिक दवा में भी सोंठ को शामिल किया गया है।चरक संहिता में पंचकोल के बारे में कहा गया है।पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः। दीपनीयः स्मृतो वर्गः कफानिलगदापहः॥पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागर यानी सोंठ को मिलाकर बनी यह दवा को डाइजेशन अच्छा करने के लिए होती है। सोंठ को आयुर्वेद में खास तौर पर पाचन शक्ति से जोड़ा गया है। बरसात में जब डाइजेशन कमजोर होता है, तब सोंठ का सेवन काफी फायदेमंद होता है। सोंठ का इस्तेमाल भारतीय रसोई में भी लंबे समय से होता आया है। इसे काढ़े और कई तरह के फूड में इस्तेमाल किया जाता है।
काली मिर्च को आयुर्वेद में मरिच कहा गया है। इसे भी डाइजेशन सिस्टम के लिए खास हर्ब माना गया है। चरक संहिता में मरिच को दीपनीय महाकषाय में शामिल किया गया है। आसान भाषा में समझें तो काली मिर्च को पाचन शक्ति को बढ़ाने वाले द्रव्यों में जगह दी गई है। आयुर्वेद में काली मिर्च का इस्तेमाल कई तरह के फूड और औषधीय योगों में किया गया है। इसका तीखा स्वाद और गर्म गुण इसे डाइजेशन से जुड़े इस्तेमाल के लिए खास बनाते हैं।बरसात के मौसम में लोग अक्सर तला-भुना और मसालेदार खाना ज्यादा खा लेते हैं। ऐसे में डाइजेशन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। आयुर्वेद में काली मिर्च जैसी दीपन हर्ब्स का उपयोग इसी समस्या के इलाज के लिए बताया गया है।
हरितकी यानी हरड़ आयुर्वेद की सबसे महत्वपूर्ण हर्ब्स में से एक है। चरक संहिता में इसका इस्तेमाल रसायन के रूप में बताया गया है।हरितकी के बारे में चरक संहिता में पूरा श्लोक दिया गया है।हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामलवणां शिवाम्। दोषानुलोमनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम्॥२९॥ आयुष्यां पौष्टिकीं धन्यां वयसः स्थापनीं पराम्। सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम्॥३०॥ कुष्ठं गुल्ममुदावर्तं शोषं पाण्ड्वामयं मदम्। अर्शांसि ग्रहणीदोषं पुराणं विषमज्वरम्॥३१॥ हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम्। कासं प्रमेहमानाहं प्लीहानमुदरं नवम्॥३२॥ कफप्रसेकं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं कामलां क्रिमीन्। श्वयथुं तमकं छर्दिं क्लैब्यमङ्गावसादनम्॥३३॥ स्रोतोविबन्धान् विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः। स्मृतिबुद्धिप्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी॥३४॥इस श्लोक में हरितकी को दीपन-पाचन गुण वाली बताया गया है। इसके साथ ही इसे शरीर के पोषण और बल से भी जोड़ा गया है। यानी आयुर्वेद के अनुसार हरितकी डाइजेशन को बेहतर रखने के साथ शरीर की ताकत बनाए रखने वाली हर्ब है।भावप्रकाश निघंटु के अनुसार ‘सिन्धूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात्। वर्षादिष्वभया प्राश्या रसायनगुणैषिणा॥ इसको सेंधा नमक के साथ खाने से पाचन शक्ति बेहतर हो जाती है।
पिप्पली को आम भाषा में लंबी मिर्च कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे सिर्फ मसाले के तौर पर नहीं देखा गया है। चरक संहिता में पिप्पली का इस्तेमाल डाइजेशन और रसायन से जुड़े कई प्रयोगों में बताया गया है।चरक संहिता के रसायन अध्याय में पिप्पली का पूरा प्रयोग इस तरह दिया गया है।पञ्चाष्टौ सप्त दश वा पिप्पलीर्मधुसर्पिषा। रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत्॥३२॥ तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्णे भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च। पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः॥३३॥ प्रयोज्या मधुसम्मिश्रा रसायनगुणैषिणा। जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्कां गलामयान्॥३४॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम्। वैस्वर्यं पीनसं शोफं गुल्मं वातबलासकम्॥३५॥चरक संहिता में पिप्पली को रसायन प्रयोग में रखा गया है और इसके इस्तेमाल को कई तरह की शारीरिक परेशानियों के इलाज में बताया गया है। इसमें ग्रहणी यानी डाइजेशन से जुड़े विकार का भी जिक्र मिलता है। पिप्पली को आयुर्वेद में डाइजेशन और शरीर की ताकत से जुड़े कई योगों में इस्तेमाल किया जाता है।
गुडूची को आम भाषा में गिलोय कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे खास तौर पर रसायन हर्ब के रूप में महत्व दिया गया है। चरक संहिता में गुडूची को रसायन के संदर्भ में रखा गया है और यह शरीर की ताकत बढ़ाती है और अग्नि यानी डाइजेशन से जुड़े लाभ देती है।चरक संहिता के रसायन अध्याय में कहा गया है किमण्डूकपर्ण्याः स्वरसंः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम्। रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्प्याः॥३०॥ आयुःप्रदानी अमयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि। मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी॥३१॥इसमें रसायन द्रव्यों को आयु, बल और अग्नि से जुड़े लाभ देने वाला बताया गया है। गिलोय का प्रयोग इम्युनिटी को भी बूस्ट करता है।
इन हर्ब्स का सेवन अगर बरसात के मौसम में किया जाए तो ये इम्युनिटी बूस्टर का भी काम करती हैं। आयुर्वेदिक डॉक्टर्स के अनुसार, इन हर्ब्स का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। सोंठ, काली मिर्च और गिलोय व पिपली का काढ़ा बनाकर पिया जा सकता है।