जब सूर्य की रोशनी पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो वह वहां मौजूद गैसों और धूल के कणों से टकराकर अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाती है। इस प्रक्रिया को रेले प्रकीर्णन (Rayleigh scattering) कहा जाता है। (Image - chatgpt)
सूर्य की रोशनी (सफेद प्रकाश) में कुल सात (7) रंग होते हैं। ये रंग बैंगनी, इंडिगो (जामुनी), नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल हैं। इनमें से नीली रोशनी की तरंगदैर्ध्य (Wavelength) कम होती है, इसलिए वह बाकी रंगों की तुलना में ज्यादा बिखरती है। यही कारण है कि हमें दिन के समय आकाश नीला दिखाई देता है।
रात के समय पृथ्वी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी होता है, जहां सूर्य की सीधी रोशनी नहीं पड़ती। ऐसे में वायुमंडल में प्रकाश का बिखराव नहीं हो पाता, और आकाश काला नजर आता है।
अगर हम चंद्रमा जैसे स्थान पर जाएं, जहां वायुमंडल नहीं है, तो वहां दिन में भी आकाश काला ही दिखाई देगा। इसका कारण यह है कि वहां प्रकाश को बिखेरने के लिए कोई माध्यम मौजूद नहीं होता।
यह सवाल कि “इतने सारे तारों के बावजूद पूरा आकाश चमकदार क्यों नहीं है?” वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:ब्रह्मांड की उम्र सीमित है (लगभग 13-15 अरब वर्ष), इसलिए बहुत दूर के तारों की रोशनी अभी तक हम तक पहुंची ही नहीं है।ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है, जिससे दूर जाते तारों की रोशनी कमजोर हो जाती है।
जब तारे या आकाशगंगाएं हमसे दूर जाती हैं, तो उनकी रोशनी की तरंगदैर्ध्य (Wavelength) बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया को डॉप्लर इफेक्ट कहा जाता है। इससे रोशनी लाल रंग की ओर खिसक जाती है (रेडशिफ्ट) और कई बार इतनी कमजोर हो जाती है कि हमें दिखाई ही नहीं देती।
अंतरिक्ष पूरी तरह अंधकारमय नहीं है। बहुत दूर के तारों और आकाशगंगाओं से आने वाली हल्की रोशनी एक बेहद धुंधली चमक पैदा करती है, लेकिन यह हमारी आंखों से साफ दिखाई नहीं देती।