दरअसल,ब्रिटिशकालीन 25 पाउंडर तोपों की जगह भारतीय सेना स्वदेशी एलएफजी का इस्तेमाल कर रही है। ये कहीं और नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के जबलपुर में बनी हैं। ये तोपें शहर की गन कैरिज फैक्ट्री में बन रही हैं।
वित्तीय वर्ष में 12 तोपों के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इनमें तीन तोप पहले ही भारतीय सेना को दी जा चुकी हैं। जीसीएफ के जनसंपर्क अधिकारी ऋतुराज द्विवेदी कहते हैं कि साल 2023 में गणतंत्र दिवस के दौरान पहली बार इन स्वदेशी तोपों ने ब्रिटिश युग की तोपों की जगह ली थी। इसे राष्ट्रपति और विदेशी मेहमानों के सम्मान में देते हैं।
राष्ट्रपति और राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान देने के लिए 52 सेकेंड में खास ब्लैंक कार्टिज से सलामी दी जाती है, जिसमें सात एलएफजी एक सिरे से लगातार फायरिंग करते हैं। असल में तोपें 8 होती हैं, जिनमें से 7 तोपों से सलामी दी जाती है। हर तोप से 3 गोले छोड़े जाते हैं।
इन तोपों की काफी सारी खासियतें हैं। पहली बात तो ये हल्की और कॉम्पैक्ट संरचना वाली होती हैं। साथ ही इनकी फायरिंग क्षमता 17 किलोमीटर की होती है। ये एयरड्रॉप व एयरलिफ्ट में सक्षम होती हैं।
इनका संचालन काफी तेज और सटीक होता है। प्रति मिनट इनकी मारक क्षमता 4 राउंड होती है। साल 1984 से इनका उत्पादन होता आ रहा है।
हर तोप से तीन गोले छोड़े जाते हैं। हमारा राष्ट्रगान जनगणमन भी 52 सेकेंड में पूरा होता है इसलिए 21 तोपों की सलामी भी 52 सेकेंड में खत्म की जाती है।