Sambhal Violence News: नवंबर 2024 की संभल हिंसा के बाद एक आरोपी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से कई तीखे सवाल पूछे हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया जा सकता है? जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है।
'आपका पूरा डिटेंशन ऑर्डर कबूलनामे पर आधारित है'
सुनवाई के दौरान बेंच ने उस कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता और कानूनी अहमियत पर सवाल उठाए, जिसके आधार पर हिरासत का आदेश जारी किया गया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि एहतियातन हिरासत सजा देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित खतरे को रोकने के लिए होती है। इसे हर चुनौती को खारिज करने के लिए एक मंत्र की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अथॉरिटी की 'सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन' या व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए कुछ ठोस सामग्री होनी चाहिए और मौजूदा मामले में पूरा डिटेंशन ऑर्डर ही कथित कबूलनामे पर आधारित है।
54 दिन बाद क्यों हुई गिरफ्तारी?
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की गिरफ्तारी में हुई देरी पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि घटना के 54 दिन बाद याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर आरोपी क्यों बनाया गया, जबकि घटना के पहले दिन से ही CCTV फुटेज उपलब्ध था। बेंच ने सवाल किया कि अगर CCTV फुटेज उपलब्ध था तो उसे प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश के समर्थन में क्यों नहीं दिखाया गया?
मोबाइल से मैसेज डिलीट किए तो पुलिस को मिला कैसे?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के पक्ष में दिखाई दे रहे एक विरोधाभास पर भी सवाल उठाया। राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अपने मोबाइल फोन से मैसेज डिलीट कर दिए थे. वहीं, उसी मामले में कथित एक मैसेज को यह दिखाने के लिए आधार बनाया गया कि वह घटनाओं में शामिल था। इस पर कोर्ट ने पूछा कि अगर आरोपी ने मैसेज डिलीट कर दिए थे तो पुलिस के पास वह कथित मैसेज आया कैसे?
'आतंक का माहौल दोबारा पैदा होने की आशंका' काफी है?
बेंच ने राज्य से यह भी पूछा कि क्या सिर्फ इस आधार पर कि किसी व्यक्ति की वजह से 'आतंक का माहौल दोबारा पैदा होने की मजबूत आशंका' है, प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी किया जा सकता है? राज्य सरकार ने हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अगर उपलब्ध सामग्री से यह संभावना सामने आती है कि व्यक्ति भविष्य में हिंसा कर सकता है या कानून के राज को चुनौती दे सकता है, तो निवारक हिरासत उचित हो सकती है।
याचिकाकर्ता ने कहा- पुलिस कस्टडी का कबूलनामा कानूनन स्वीकार्य नहीं
याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर की गई थी, जो कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है।उसने यह भी कहा कि सिर्फ कई आपराधिक मामलों का होना अपने आप में NSA के तहत हिरासत का आधार नहीं बन सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से रेखा बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु और अमीना बेगम बनाम स्टेट ऑफ तेलंगाना जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल यह आशंका कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति दोबारा अपराध कर सकता है, अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं है।
संभल हिंसा के बाद हुई थी कार्रवाई
मुल्ला अफरोज पर नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर हुए सर्वे के बाद भड़की हिंसा में शामिल होने और उसे कथित तौर पर अंजाम देने का आरोप है। हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी।
अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी, लेकिन इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को NSA, 1980 के तहत उसके खिलाफ डिटेंशन ऑर्डर जारी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इस हिरासत के आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
'क्या ऐसे ही डिटेंशन ऑर्डर पास करते हैं?'
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने निवारक हिरासत की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मौखिक टिप्पणी कि, 'क्या ऐसे ही डिटेंशन ऑर्डर पास करते हैं?'
उन्होंने यह भी कहा कि आशंका के आधार पर गिरफ्तारी कोई न्यायिक कार्य नहीं बल्कि प्रशासनिक विवेक का इस्तेमाल है, लेकिन इसका इस्तेमाल तय नियमों के मुताबिक होना चाहिए। जहां ऐसे स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं, वहां अथॉरिटी को 'उचित और निष्पक्ष' तरीके से काम करना होगा।
UP सरकार से कल तक जवाब मांगा
बेंच ने राज्य सरकार से विशेष रूप से जवाब मांगा है कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को निवारक हिरासत का आदेश जारी करने के लिए आधार बनाया जा सकता है? राज्य को इस सवाल पर अपना जवाब बुधवार सुबह दाखिल करने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
