रेलवे का ध्यान अब उन शहरों और क्षेत्रों पर है जहां ट्रैफिक दबाव ज्यादा है या जहां सीधी और तेज रेल कनेक्टिविटी नहीं है। उत्तर भारत, पूर्वी भारत और मध्य भारत के कई औद्योगिक और धार्मिक शहरों को नई लाइनों, मल्टी-ट्रैकिंग और तेज ट्रेनों से जोड़े जाने की योजना है। इससे छोटे शहरों की दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों से दूरी घटेगी। (सांकेतिक चित्र)
वित्त वर्ष 2026 में भारतीय रेलवे को 2.52 लाख करोड़ रुपये का बजट मिला था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक 77 फीसदी राशि खर्च हो चुकी है। ऐसे में अगले बजट में रकम भले ही समान रहे, लेकिन उसके इस्तेमाल की दिशा बदलेगी। (सांकेतिक चित्र)
आने वाले बजट में वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों के लिए ज्यादा फंड आवंटित किया जा सकता है। इन ट्रेनों का रूट ऐसे शहरों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है, जहां यात्री संख्या ज्यादा है लेकिन अब तक प्रीमियम ट्रेन सुविधाएं सीमित थीं। इससे टियर-2 और टियर-3 शहरों को भी तेज और आधुनिक रेल सेवा मिलेगी। (सांकेतिक चित्र)
रेलवे नेटवर्क का 99 फीसदी से ज्यादा विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। इससे डीजल पर निर्भरता घटेगी और संचालन लागत कम होगी। इसका सीधा फायदा यह होगा कि बचे हुए संसाधनों को नए ट्रैक, नई लाइन और नए शहरों को जोड़ने में लगाया जा सकेगा। (सांकेतिक चित्र)
मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए पहले ही 19 हजार करोड़ रुपये तय किए जा चुके हैं। इस परियोजना से न सिर्फ मुंबई और अहमदाबाद, बल्कि रास्ते में आने वाले शहरों की कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियां भी तेज होंगी। भविष्य में ऐसे और हाई-स्पीड कॉरिडोर दूसरे हिस्सों में भी प्रस्तावित हो सकते हैं। (सांकेतिक चित्र)
रेलवे बजट में ट्रैक सुरक्षा, लाइन क्षमता बढ़ाने और भीड़भाड़ वाले सेक्शन को राहत देने के लिए खास प्रावधान किए जा सकते हैं। इससे महानगरों के आसपास के उपनगरीय और सैटेलाइट शहरों को बेहतर और भरोसेमंद रेल सेवा मिलेगी। (सांकेतिक चित्र)
रेलवे का दीर्घकालिक लक्ष्य सिर्फ बड़े शहरों को जोड़ना नहीं, बल्कि छोटे और उभरते शहरों को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से मजबूती से जोड़ना है। नई लाइनों, डबलिंग और आधुनिक ट्रेनों के जरिए इन शहरों में निवेश, रोजगार और आवागमन, तीनों को बढ़ावा मिलेगा। (सांकेतिक चित्र)